विषाणु
वायरस अति सूक्ष्म होते हैं, तथा संभवतः अभी तक ज्ञात जीवधारियों में सबसे प्रथम निर्मित जीव होंगे। यह बैक्टीरिया जीवों से भी सुक्ष्म होते हैं। सभी वायरस अनिवार्य परजीवी के रूप में किसी जीवित पोषक में ही जीवन व्यतीत कर सकते हैं। इनकी उपस्थिति किसी पौधे या जन्तु पोषक में इनके द्वारा उत्पन्न रोग के द्वारा ही प्रदर्शित होती है। वायरस का शाब्दिक अर्थ द्रव रूप में विष होता है। अतः पोषक-कोशिका या जीव में इनकी उपस्थिति सदैव ही हानिकारक होती है। इसीलिए इन्हें हिन्दी में विषाणु कहते हैं। वायरस का अध्ययन कराने वाली सूक्ष्म में जीव-विज्ञान की शाखा को वायरोलॉजी कहते हैं।
वायरस के सामान्य लक्षण–
1. ये अम्ल, क्षार एवं लवणों के भी प्रतिरोधी होते हैं।
2. वायरस उच्च तापक्रम के प्रतिरोधक होते हैं परंतु बहुत अधिक तापक्रम पर यह अक्रियशील होते हैं।
3. इन पर सूर्य के प्रकाश का सीधा प्रभाव नहीं पड़ता।
4. किसी वायरस के निचोड़ में जल या किसी बर्फ घोल के मिलाने से वायरस संक्रमण अवस्था में नहीं रह पाते।
वायरस जीवित या अजीवित–
वायरल जीवों को जीवधारियों की श्रेणी में सम्मिलित नहीं किया जाता। वायरस जीवित है या अजीवित इस बारे में दुविधा निम्न कारणों से हैं। एक और तो वायरसों में मेटाबोलिक क्रियाओं हेतु कोई व्यवस्था नहीं होती तथा बिना किसी पोषक कोशिका के उनमें जन्म नहीं होता। दूसरी और उनमें न्यूक्लिक अम्ल एवं जीन होते हैं। तथा जनन में उनकी वंशागति जीन द्वारा नियंत्रित होती है (यह जीवितो का प्रमुख लक्षण है)।
1935 में वैज्ञानिक स्टेनले ने टोबेको मोजेक वायरस के रवे बना लिए। इन रवो को जब तंबाकू के पौधे में इंजेक्शन द्वारा प्रभावित किया गया तो वह पुनः सक्रिय हो गए उनमें प्रजनन भी हुआ था। पौधे में रोग के लक्षण भी दिखे वायरस को रवे के रूप में प्राप्त करने में यह सिद्ध हुआ। कि वाइरस निश्चित रूप से कोशिकाएँ न होकर एक अन्य प्रकार के रासायनिक संगठन वाले पदार्थ है। कुछ वैज्ञानिक वाइरसो को जीवित एवं अजीवित की मध्य अवस्था में मानते हैं। वाइरस को जीवित या जीवित की मान्यता उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी कि उन्हें एक रोग जनन के रूप में मानना इस प्रकार के वाइरस को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है। वायरस कार्बनिक पदार्थ के ऐसे पर आसूचना रोगजनक कारण है। जो किसी जीवित बैक्टीरिया पौधे और जंतु में ही जनन कर सकते।
वाइरस की रचना वायरस मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं।
1. बैक्टीरियोफेजेस
2. जन्तु एवं पौधे के वाइरस
1. बैक्टीरियोफेजेस–
जो वाइरस बैक्टीरिया को पोषक बनाते हैं उन्हें बैक्टीरियोफेज या संक्षिप्त फेज करते हैं।
इनकी खोज 1915 में फ्रेडरिक ट्वीट ने इंग्लैंड में एवं 1917 में फेलिक्स डी हेरेल ने पेरिस में की थी। पूर्ण रूप से संक्रमण के योग्य वायरस के वाइरियोन कहते हैं ।
बैक्टीरियोफेज न्यूक्लियोप्रोटीन के बने होते हैं। मध्य भाग में न्यूक्लिक अम्ल एवं उसको घेरती हुई प्रोटीन की एक भित्ती होती है। यह अनेक प्रकार के होते हैं। उनमें से अधिकांश की टैडपोल के सामान एक पूछ नुमा रचना भी होती है। जिसमें मध्यम से वायरस पोषक कोशिका से चिपकाते हैं। प्रोटीन भित्ति को कैप्सिड कहते हैं। जिन वायरस की पूंछ होती है उनकी पूछँ से लंबी टांगो जैसे तंतु निकले होते हैं। बिना पूछँ वाले वायरस या तो छड़नुमा या फिर घनाकार होते हैं। घनाकार वायरस को पॉलीहेडल फेस भी कहते हैं।इनकी अनेक सतह होती है।
2. जन्तु एवं पौधों के वायरस–
ये भी बैक्टीरियोफेज के सामान प्रोटीन भित्ति, कैप्सिड से घिरे न्यूक्लिक अम्ल से बने होते हैं। ये गोलाकार कुंडली अथवा अन्य जटिल सिमिट्री के होते हैं। पौधे के वायरस में सबसे सूक्ष्म शलजम का पीला मोजेक वायरस एवं सबसे बड़ा टोबैको मोजैक वायरस होता है।
इन 👇परीक्षापयोगी प्रकरणों के बारे में भी जानें।
1. जांतव रेशे
2. प्राणियों में पोषण- पाचन तंत्र
3. पादपों में पोषण- प्रकाश संश्लेषण
4. विज्ञान की शाखाएँ-जीवधारियों का नामकरण व वर्गीकरण
5. पारिस्थितिकी तंत्र जैविक एवं अजैविक घटक
आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com
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