प्रकाश का प्रकीर्णन
जब प्रकाश किसी ऐसे माध्यम से होकर गुजरता है, जिसमें धूल तथा अन्य पदार्थों के अत्यन्त सूक्ष्म कण होते हैं, तो इनके द्वारा प्रकाश सभी दिशाओं में (कुछ दिशाओं में कम तथा कुछ में अधिक) प्रसारित हो जाता है। इस घटना को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं। लॉर्ड रेले के अनुसार किसी रंग का प्रकीर्णन उसकी तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करता है तथा जिस रंग के प्रकाश की तरंगदैर्ध्य सबसे कम होती है, उस रंग का प्रकीर्णन सबसे अधिक तथा जिस रंग के प्रकाश की तरंगदैर्ध्य सबसे ज्यादा होती है, उस रंग का प्रकीर्णन सबसे कम होता है। इसी. कारण से कि सूर्य के प्रकाश में बैंगनी रंग, जिसकी तरंगदैर्घ्य सबसे कम होती है। रंग का प्रकीर्णन सबसे अधिक तथा लाल रंग, जिसकी तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक होती है का प्रकीर्णन सबसे कम होता है।
प्रकाश के प्रकीर्णन के उदाहरण–
प्रकाश के प्रकीर्णन के कई उदाहरण दैनिक जीवन में देखने
को मिलते हैं।
1. सूर्य उगते व डूबते समय प्रकीर्णन के कारण ही लाल दिखाई देता है। जब सूर्य उगता है या डूबता है, तो उसके प्रकाश को हम तक पहुँचने में वायुमंडल के धूल आदि कणों से होकर अधिक दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उसका इन कणों से प्रकीर्णन हो जाता है। चूँकि अन्य रंगों की तुलना में लाल रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम होता है, अतः हम तक पहुँचने वाले प्रकाश में लाल रंग का आधिक्य रहता है, जिसके कारण सूर्य उगते व डूबते समय लाल दिखायी देता है।
2. आकाश का रंग सूर्य के प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण नीला दिखायी देता है। जब सूर्य का प्रकाश जो कि विभिन्न रंगों का मिश्रण है, वायुमंडल से होकर गुजरता है, तो वायु में उपस्थित विभिन्न अणुओं, धूल एवं धुएँ के कणों द्वारा उसका प्रकीर्णन हो जाता है। दिन के समय जब सूर्य सीधा आकाश में मनुष्य के सिर के ऊपर होता है, तो मनुष्य केवल प्रकीर्णित प्रकाश ही देख पाता है। चूँकि बैंगनी रंग का प्रकीर्णन सबसे अधिक व लाल रंग का सबसे कम होता है, अतः प्रकीर्णित प्रकाश का मिश्रित रंग हल्का नीला होता है। इसी कारण आकाश नीला दिखाई देता है।
3. समुद्र का पानी भी प्रकीर्णन के कारण नीला दिखाई देता है।
4. जब सूर्य दिन के समय सिर के ऊपर होता है, तो प्रकाश को वायुमंडल में कम दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे प्रकीर्णन कम होता है, व सूर्य सफेद दिखाई पड़ता है।
वर्ण-विपथन–
जब हम श्वेत प्रकाश से लेंस द्वारा किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब बनाते हैं, तो प्रतिबिम्ब प्रायः रंगीन व अस्पष्ट होता है। लेंस द्वारा उत्पन्न प्रतिबिम्व के इस दोष को ही वणन कहते हैं। यह दोष इसीलिए उत्पन्न होता है, क्योंकि उस के पदार्थ का अपवर्तनांक तथा इसके कारण लेंस की फोकस दूरी भिन्न-भिन्न रंगों के लिए भिन्न-भिन्न होती है।
प्रकाश का विवर्तन
प्रकाश का विवर्तन इसके तरंग प्रकृति की पुष्टि करता है। ध्वनि तरंगों की तरंगदैर्घ्य प्रकाश के तरंगदैर्ध्य की तुलना में बहुत अधिक होती है, इस कारण से ध्वनि तरंगों में विवर्तन की घटना आसानी से देखने को मिलती है। ध्वनि तरंगें अवरोधों पर आसानी से मुड़कर हमें सुनाई देती हैं, जबकि प्रकाश तरंगों का तरंगदैर्ध्य हमारे जीवनोपयोगी वस्तुओं के आकार की तुलना में बहुत होती है, जिसके कारण हमें प्रकाश के विवर्तन की घटना साधारणतया देखने को नहीं मिलती है।
यदि किसी प्रकाश स्रोत व पर्दे के बीच कोई अपारदर्शी अवरोध रख दिया जाए, तो हमें पर्दे पर अवरोध की स्पष्ट छाया दिखलायी पड़ती है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रकाश का संचरण सीधी रेखा में होती है। लेकिन यदि अवरोध का आकार बहुत छोटा हो, तो प्रकाश अपने सरल रेखीय संचरण से हट जाता है, वह अवरोध के किनारों पर मुड़कर छाया में प्रवेश कर जाता है। प्रकाश के इस प्रकार अवरोध के किनारों पर थोड़ा मुड़कर उसकी छाया में प्रवेश करने की घटना को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं। विवर्तन के कारण अवरोध की छाया के किनारे तीक्ष्ण नहीं होते हैं। प्रकाश के विवर्तन के कारण ही दूरदर्शी में तारों के प्रतिबिम्ब तीक्ष्ण बिन्दुओं की तरह दिखायी न देकर अस्पष्ट धब्बों की तरह दिखायी देते हैं। प्रकाश का विवर्तन अवरोध के आकार पर निर्भर करता है। यदि अवरोध का आकार प्रकाश की तरंगदैर्घ्य की कोटि का है, तो विवर्तन स्पष्ट होता है और यदि अवरोध का आकार प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की तुलना में बहुत बड़ा है, तो विवर्तन उपेक्षणीय होता है।
आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com
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