ब्रह्माण्ड | the universe

प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने चारों ओर स्थित वातावरण के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने के लिए उत्सुक रहा है।

ब्रह्माण्ड | the universe

ब्रह्मांड (Universe) -

प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने चारों ओर स्थित वातावरण के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने के लिए उत्सुक रहा है। पृथ्वी के चारों ओर अनन्त सीमा में फैले वृहत्तर पर्यावरण को ब्रह्माण्ड कहते हैं। अवलोकनों तथा प्रेक्षणों पर आधारित ब्रह्मांड के अध्ययन करने वाले विज्ञान को खगोलशास्त्र कहते हैं। ब्रह्माण्ड के तीन प्रमुख अवयव- मंदाकिनियाँ, तारे व सौरमण्डल हैं।
ब्रह्माण्ड में असंख्य तारे हैं। ये तारे चारों ओर एक समान रूप से वितरित न होकर बड़े-बड़े गुच्छों अथवा समूहों में पाए जाते हैं। तारों के किसी ऐसे समूह को मंदाकिनी या नीहारिका या गैलेक्सी (Galaxy) कहते हैं। हमारा सूर्य जिस मंदाकिनी में स्थित है उसे आकाशगंगा कहते हैं। खगोलज्ञों की अनुमानित गणना के अनुसार ब्रह्माण्ड में लगभग दस अरब (1011) मंदाकिनियाँ हैं। प्रत्येक मंदाकिनी में औसतन कई अरब तारे होते हैं। हमारा सूर्य ऐसा ही एक तारा है जिसके चारों ओर आठ ग्रह परिक्रमा लगाते रहते हैं। पृथ्वी इन ग्रहों में से एक ग्रह है जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाती है। सूर्य की परिक्रमा करते ग्रह तथा उनके उपग्रह आदि को मिलाकर हमारा सौरमण्डल बनता है। हमारा सौरमण्डल हमारी नीहारिका आकाशगंगा के बाहरी छोर पर स्थित है। चित्र 1.1 में दर्शाए अनुसार आकाशगंगा सर्पिल आकार की है और यह धीरे-धीरे दक्षिणावर्त घूम रही है।

तारे (Stars)-

तारे ऐसे खगोलीय पिण्ड हैं जो लगातार प्रकाश एवं ऊष्मा उत्सर्जित करते हैं। इसीलिए रात में आकाश में झिलमिलाते तारे देखे जा सकते हैं। ग्रह, सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं इसलिए उनकी चमक स्थिर होती है। इस तरह ग्रह और तारों की अलग पहचान आगे विस्तार से वर्णित है। सूर्य भी एक तारा है। अन्य तारों की तुलना में पृथ्वी के निकट होने के कारण सूर्य बड़ा दिखाई देता है। अन्य तारे बिन्दु जैसे इसलिए दिखाई देते हैं क्योंकि वे पृथ्वी से अत्याधिक दूरी पर हैं जबकि उनमें से कुछ तारे तो सूर्य की तुलना में अत्याधिक बड़े हैं। हमें ऐसा लगता है कि तारे केवल रात्रि में ही आकाश में प्रकट होते हैं, परन्तु ऐसा नहीं है। दिन के समय आकाश में सूर्य के प्रकाश की चमक के कारण तारे हमें दिखाई नहीं देते हैं।
सूर्य सहित सभी तारे, किसी न किसी खगोलीय पिंड समूह की तीव्र गति से परिक्रमा कर रहे हैं। परन्तु उच्च चाल से गतिशील होने पर भी पृथ्वी से देखने पर हमें किन्हीं दो तारों के बीच की दूरी परिवर्तित होती प्रतीत नहीं होती है। इसका कारण यह है कि तारे हमसे इतनी अधिक दूरी पर हैं कि उनके बीच की दूरी में होने वाले परिवर्तनों का आभास हमें कुछ वर्षों में, यहाँ तक कि पूरे जीवन काल में भी नहीं हो पाता है।
पृथ्वी से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि मानो सूर्य अथवा तारे पूर्व से पश्चिम की ओर गति कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि पृथ्वी अपने केन्द्र से गुजरने वाले एक काल्पनिक अक्ष के परिधि में पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन कर रही है। परन्तु फिर भी एक तारा ऐसा है जो हमें स्थिर प्रतीत होता है क्योंकि यह पृथ्वी के घूर्णन अक्ष के समीप स्थित है जैसा चित्र (1.2) में प्रदर्शित है। यह तारा उत्तर दिशा में स्थित है और इसे हम ध्रुव तारा या पोलस्टार कहते हैं। हमारे पूर्वज यात्रा करते समय दिशा ज्ञात करने के लिए ध्रुव तारे का सर्वाधिक उपयोग करते रहे हैं।

तारामण्डल (Constellation)

आकाश में कुछ तारे समूह के रूप में एकत्रित होकर सुन्दर आकृतियाँ बनाते हैं जिन्हें <भb>तारामण्डल कहते हैं। हमारे पूर्वजों ने इन तारामण्डलों का नाम उन वस्तुओं के नाम पर रखा जिससे वे मिलते-जुलते है जैसे कि सिंह, मेष, मौन, कुम्भ, सप्तर्षि आदि। वृहत सप्तर्षि या उस मेजर एक महत्वपूर्ण तारामण्डल है। इसमें अनेक तारे है जिसमें सात सर्वाधिक चमकदार तारे आसानी से दिखाई देते है जो प्रश्न चिन्ह जैसी आकृति बनाते प्रतीत होते हैं। इसके शीर्ष भाग पर स्थित दो तारे संकेतक तारे कहलाते हैं क्योंकि इनको मिलाने वाली रेखा ध्रुव तारे की ओर संकेत करती है। इसी प्रकार लघु-सप्तर्षि या उस माइनर तारामण्डल में भी अधिक चमक वाले सात प्रमुख तारे है। पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में इस तारामण्डल को प्रायः बसन्त ऋतु में देखा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त मृग या ओरायन एक अन्य तारामण्डल है जो अत्यधिक चमकीला होता है। इसे शीत ऋतु में देखा जा सकता है। इसमें भी सात चमकीले तारे हैं जिनमें से चार किसी चतुर्भुज की आकृति बनाते प्रतीत होते हैं। भारत में यह काल-पुरुष के नाम से प्रसिद्ध हैं। रात्रि के समय अपने घर की छत अथवा खुले मैदान से आकाश में इन तारामण्डलों को पहचानने का प्रयास कीजिए।

सौरमण्डल या सौर परिवार-

आकाशगंगा वह भाग जिसमें हम लोग रहते हैं। सौर परिवार कहलाता है। सौर परिवार में सूर्य के अतिरिक्तआठ ग्रह,कुछ उपग्रह, लघु ग्रह तथा बड़ी संख्या में धूमकेतु शामिल हैं। इन्हें सौरमण्डल भी कहते हैं।

सूर्य(Sun)-

सूर्य हमारे सबसे नजदीक का तारा है। यह लगभग 500 करोड़ वर्ष पहले बना है। तभी से यह लगातार ढेर सारा प्रकाश तथा ऊष्मा उत्सर्जित कर रहा है। अगर इसी तरह यह अपनी ऊष्मा का उत्सर्जन करता रहा तो यह लगभग 500 करोड़ वर्ष और अस्तित्व में रहेगा। इसके चारों ओर परिक्रमा करने वाले सभी ग्रहों की ऊष्मा तथा प्रकाश का स्रोत सूर्य ही है।

ग्रह (Planets) -

जब हम रात के समय आकाश में देखते हैं तो कुछ पिण्ड तारों के समान दिखाई देते हैं इनमें से कुछ तारों की तुलना में अधिक चमकदार एवं बड़े दिखाई पड़ते हैं। समय के साथ तारों के सापेक्ष इनकी स्थितियों में परिवर्तन होता रहता है। ये खगोलीय पिण्ड ग्रह कहलाते हैं। ग्रह ऐसे खगोलीय पिण्ड हैं जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं। ये स्वयं प्रकाश उत्सर्जित नहीं करते। ग्रह हमें तारों की भाँति चमकीले इसलिए दिखाई पड़ते हैं क्योंकि ये अपने ऊपर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं।

तारों तथा ग्रह में अन्तर

तारे

1. ये अपनी स्वयं की ऊष्मा तथा प्रकाश उत्सर्जित करते हैं।
2. ये टिमटिमाते दिखते हैं।
3. ये अत्यधिक दूरी के कारण बिन्दु के समान प्रतीत होते हैं।

ग्रह

1. ये अपने ऊपर पड़ने वाले सूर्य प्रकाश को परावर्तित करते हैं।
2. ये टिमटिमाते नहीं है।
3. ये डिस्क (चकती) के समान प्रतीत होते हैं।

हमारे सौरमण्डल में आठ ग्रह है उनमें से प्रत्येक अपने निश्चित पथ पर सूर्य की परिक्रमा करता है जिसे उसकी कथा कहते है। किसी ग्रह द्वारा सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरी करने में लगे समय को उस ग्रह का परिक्रमण काल (orbital period) कहते हैं। प्रत्येक ग्रह का सूर्य के परितः परिक्रमण काल भिन्न - भिन्न होता है। सूर्य से बढ़ती हुई दूरी के क्रम में आठ ग्रह बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण (यूरेनस) तथा वरुण (नेप्ट्यून) दर्शाए गए हैं। इस प्रकार सौरमण्डल में बुध ग्रह सूर्य के सबसे नजदीक तथा (नेप्ट्यून) ग्रह सूर्य से सबसे दूर स्थित है।

1. बुध (Mercury)-

बुध ग्रह सूर्य के सबसे निकट का ग्रह है। अतः यह अधिकांश समय सूर्य की दमक में छिपा रहता है। तथापि समय-समय पर इसे सूर्योदय से कुछ पहले अथवा सूर्यास्त के तुरंत बाद क्षितिज के पास देखा जा सकता है। यह पृथ्वी से काफी छोटा ग्रह है। इसका आकार लगभग चन्द्रमा के समान है। इस ग्रह पर वायु नहीं है इस कारण इस पर जीवन सम्भव नहीं है।

2. शुक्र (Venus)-

यह ग्रह बुध तथा पृथ्वी के बीच में स्थित है। इसका वायुमण्डल घने बादलों से घिरा है जो कि इस पर आपतित सूर्य के प्रकाश का लगभग तीन चौथाई (75%) भाग परावर्तित कर देता है। अतः यह रात के समय में समस्त आकाशीय पिण्डों में सबसे ज्यादा चमकीला दिखाई देता है। इसका आकार लगभग पृथ्वी के आकार के समान है परन्तु द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 4/5 भाग होता है। इसका कोई भी उपग्रह नहीं पहचाना गया है।

3. पृथ्वी (Earth)-

पृथ्वी एक ऐसा ग्रह है जिस पर ऑक्सीजन, पानी तथा अनुकूल तापमान है, इस कारण पृथ्वी पर जीवन संभव है। सूर्य से दूरी के क्रम में पृथ्वी तीसरा ग्रह है। पृथ्वी का केवल एक प्राकृतिक उपग्रह (चन्द्रमा) है। पृथ्वी एक काल्पनिक अक्ष के सापेक्ष घूर्णन करती है, जो इसके उत्तर तथा दक्षिणी ध्रुवों से गुजरता है। पृथ्वी का यह घूर्णन अक्ष इसकी कक्षा के तल से थोड़ा झुक हुआ है। पृथ्वी अपने अक्ष पर एक सम्पूर्ण चक्कर (घूर्णन) के लिए लगभग 24 घण्टे का समय लेती है। पृथ्वी पर दिन और रात इसकी घूर्णन गति के कारण होते हैं।
पृथ्वी अपनी अक्ष पर घूर्णन के साथ-साथ सूर्य की परिक्रमा भी कर रही है। पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा लगभग एक वर्ष अर्थात् 365 दिन में पूरा करती है परन्तु वास्तव में पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा लगभग 365.25 दिन में पूरा करती है। इन दोनों मानों का अन्तर लगभग 0.25 दिन अर्थात् 6 घंटे होता है। चार वर्षों में यह अन्तर (4 × 6 = 24 घंटे) अर्थात् एक दिन हो जाता है। अतः प्रत्येक चौथा वर्ष 366 दिन का मान्य किया गया है। इस चौथे वर्ष को लोंद वर्ष (Leap Year) कहते हैं।
पृथ्वी पर मौसम का परिवर्तन पृथ्वी की घूर्णन अक्ष में झुकाव तथा सूर्य के सापेक्ष इसकी स्थिति में परिवर्तन के कारण होता है। पृथ्वी की कक्षा में इसकी 4 स्थितियाँ दर्शाई गई हैं। बच्चो ध्यान दीजिए कि पृथ्वी के घूर्णन अक्ष का झुकाव सदैव एक ही दिशा में बना रहता है। जिससे पृथ्वी के उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्द्ध की सूर्य के सापेक्ष स्थितियाँ बदलती रहती हैं। जब उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुका होता है (जैसा 21 जून को होता है) तो हम ग्रीष्म ऋतु का अनुभव करते हैं जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में शीत ऋतु होती है। इसके विपरीत 22 दिसम्बर से दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की ओर होता है जिससे वहाँ ग्रीष्म ऋतु तथा उत्तरी गोलार्द्ध में शीत ऋतु होती है। इन दोनों ऋतुओं के बीच में हेमन्त तथा बसन्त ऋतु का आगमन होता है।
इस प्रकार 21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे लम्बा दिन तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है। इसके विपरीत 22 दिसम्बर को दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे लम्बा दिन तथा उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है। 23 सितम्बर व 21 मार्च को सम्पूर्ण पृथ्वी पर दिन व रात बराबर होते हैं।

4. मंगल (Mars)-

इसे पृथ्वी से देखा जा सकता है। इसकी त्रिज्या, पृथ्वी की त्रिज्या के आधे से कुछ अधिक होती है तथा इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 1/9 भाग होता है। यह पृथ्वी से लाल रंग का दिखता है। अतः इसे लाल ग्रह भी कहते हैं। इस पर वायुमण्डल की सतह बहुत पतली होने के कारण खगोलशास्त्री दूरदर्शी की सहायता से मंगल की सतह को आसानी से देख सकते हैं। इस सतह पर होने वाले कुछ परिवर्तनों से यह अनुमान लगाया गया है कि इस पर पानी हो सकता है। परन्तु अभी तक इस ग्रह पर पानी या जीवन की पुष्टि नहीं हो सकी है। इसके दो प्राकृतिक उपग्रह हैं- फोबोस तथा डीबोस।

5. बृहस्पति (Jupiter)-

यह सभी ग्रहों में सबसे बड़ा ग्रह है। इसका द्रव्यमान शेष सभी ग्रहों के सम्मिलित द्रव्यमान से भी अधिक है। शुक्र तथा कभी-कभी मंगल के अतिरिक्त यह सभी ग्रहों से अधिक चमकीला दिखाई देता है। यद्यपि यह पृथ्वी तथा मंगल ग्रह की तुलना में बहुत कम सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है, फिर भी यह अधिक चमकीला दिखाई देता है क्योंकि इसके वायुमण्डल की घनी परत अधिकांश सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर देती है। प्राप्त जानकारी के अनुसार बृहस्पति के 60 प्राकृतिक उपग्रह के हैं। गनीमेड बृहस्पति का सबसे बड़ा प्राकृतिक उपग्रह है जिसका अपना चुम्बकीय क्षेत्र है। बृहस्पति के चारों ओर धुँधले से वलय भी दिखाई पड़ते हैं।

6. शनि (Saturn)-

यह ग्रह सूर्य से अत्यधिक दूर स्थित होने के कारण अधिक ठण्डा होता है। द्रव्यमान, आकार तथा बनावट में यह बृहस्पति ग्रह के लगभग समान होता है परन्तु इसकी सूर्य से दूरी बृहस्पति की सूर्य से दूरी की लगभग दो गुनी होती है।
शनि के चारों ओर तीन वलय हैं जिनके कारण यह अन्य ग्रहों से अलग तथा अतिसुंदर दिखाई देता है। वर्ष 2007 तक शनि के 60 प्राकृतिक उपग्रह की पहचान हो चुकी है। टाइटन शनि का सबसे बड़ा प्राकृतिक उपग्रह है।

7. अरुण (Uranus)-

दूरदर्शी की सहायता से खोजा गया यह पहला ग्रह है। इसकी खोज न् 1781 ई. में विलियम हर्शल ने की थी। किन्तु इसके पूर्व भी अनेक खगोलशास्त्रियों ने इस ग्रह को आक श में देखा था। लेकिन वे इसे ग्रह न समझकर तारा समझ बैठे। यह दूरदर्शी से देखने पर एक चकती के समन प्रतीत होता है। अभी तक इसके 21 प्राकृतिक उपग्रहों की खोज हो चुकी है।

8. वरुण (Neptune)-

यह सूर्य का आठवाँ ग्रह है। इस ग्रह के आठ प्राकृतिक उपग्रह हैं जिनमें से एक ट्राइटॉन उपग्रह सौरमण्डल में सबसे बड़े उपग्रहों में से एक है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार नौ ग्रह माने जाते है परंतु 24 अगस्त 2006 को अन्तर राष्ट्रीय खगोल विज्ञान यूनियन द्वारा पारित प्रस्ताव अनुसार प्लूटों अब ग्रह की परिभाषा में नहीं आता अतः उसे ग्रहों में नहीं गिना जाना है यह एक बौना ग्रह है। प्लूटो अपनी कक्षा के क्षेत्र में एकलौता नहीं हैं अपितु इस क्षेत्र मे अनेक ऐसे पिंड हैं जो प्लूटो से आकार में बड़े या छोटे है इस क्षेत्र को क्युपर बेल्ट कहाँ जाता है जो नेपच्युन की कक्ष से लेकरसूर्यमाला के बाहरी क्षेत्र तक फैला है।
1. वह खगोलीय पिंड सूर्य का परिभ्रमण करता हो।
2. उस पिंड का गुरुत्व स्वयं ही इतना शक्तिशाली हो कि जिसके खिंचाव के कारण पिंड का आकार एक ठोस वलय का रूप हो।
3. जिस कक्षा में वह पिंड सूर्य के चारों ओर घूम रहा है, उस कक्षा के आसपास किसी भी अन्य बड़े पिंड का अस्तित्व ना हो।
अगर वह तीन संकल्पनाओं का अवधारण वह खगोलीय पिंड करता हो तो उसे ग्रह की संज्ञा दी जा सकती है।

सौर परिवार के ग्रहों के संबंध में कुछ रोचक तथ्य

बुध -

त्रिज्या (किलोमीटर)– 2400
सूर्य से दूरी (किलोमीटर)– 57,900,000
द्रव्यमान (पृथ्वी के द्रव्यमान के पदों में)– 0.05
घूर्णन काल– 1407 घंटे
परिक्रमण काल– 88 दिन

शुक्र -

त्रिज्या (किलोमीटर)– 6150
सूर्य से दूरी (किलोमीटर)– 108,200,000
द्रव्यमान (पृथ्वी के द्रव्यमान के पदों में)– 0.8
घूर्णन काल– 5832 घंटे
परिक्रमण काल– 224.7 दिन

पृथ्वी -

त्रिज्या (किलोमीटर)– 6400
सूर्य से दूरी (किलोमीटर)– 149,600,000
द्रव्यमान (पृथ्वी के द्रव्यमान के पदों में)– 1.0
घूर्णन काल– 24घंटे
परिक्रमण काल– 365.25 दिन

मंगल -

त्रिज्या (किलोमीटर)– 3400
सूर्य से दूरी (किलोमीटर)– 227,900,000
द्रव्यमान (पृथ्वी के द्रव्यमान के पदों में)– 0.1
घूर्णन काल– 24.6घंटे
परिक्रमण काल– 687 दिन

बृहस्पति -

त्रिज्या (किलोमीटर)– 71500
सूर्य से दूरी (किलोमीटर)– 778,300,000
द्रव्यमान (पृथ्वी के द्रव्यमान के पदों में)– 318
घूर्णन काल– 9.9 घंटे
परिक्रमण काल– 4331 दिन

शनि -

त्रिज्या (किलोमीटर)– 57600
सूर्य से दूरी (किलोमीटर)– 1,427,000,000
द्रव्यमान (पृथ्वी के द्रव्यमान के पदों में)–95
घूर्णन काल– 10.7 घंटे
परिक्रमण काल– 10747 दिन

यूरेनस -

त्रिज्या (किलोमीटर)– 25500
सूर्य से दूरी (किलोमीटर)– 2,870,000,000
द्रव्यमान (पृथ्वी के द्रव्यमान के पदों में)– 15
घूर्णन काल– 17.2 घंटे
परिक्रमण काल– 30589

नेप्ट्यून -

त्रिज्या (किलोमीटर)– 2500
सूर्य से दूरी (किलोमीटर)– 4,594,000,000
द्रव्यमान (पृथ्वी के द्रव्यमान के पदों में)– 17
घूर्णन काल– 16.1 घंटे
परिक्रमण काल– 59800 दिन
सौर परिवार में कुछ अन्य खगोलीय पिण्ड भी हैं। आकाश में इनकी गति भी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण. बल के कारण ही है। अतः इन्हें भी सौर परिवार का सदस्य माना जाता है।

ग्रहिकाएँ (Asteroids)-

मंगल तथा बृहस्पति के बीच की दूरी अत्यधिक (लगभग 55 करोड़ किलोमीटर) है। इस क्षेत्र में हजारों छोटे-बड़े पिण्ड हैं जो सूर्य का चक्कर लगाते हैं। इन्हें लघुग्रह अथवा ग्रहिकाएँ कहते हैं। ये चट्टानों और धातुओं से बने हैं। इनका आकार सूक्ष्म कण से लेकर कई किलोमीटर व्यास वाले गोले तक का है। इनकी कक्षाएँ अलग-अलग होती हैं तथा अत्यधिक लम्बी दूरी तक फैली हैं और एक झुण्ड का निर्माण करती हैं। यह माना जाता है लघुग्रह वे पिण्ड होते हैं जो एक ग्रह के रूप में एकत्रित नहीं हो पाए। इन्हें उच्च कोटि के दूरदर्शी से आसानी से देखा जा सकता है।

उल्काएँ तथा उल्का पिण्ड (Meteorites)-

आपने कुछ पिण्ड देखे होंगे जो आकाश से गिरते समय चमक पैदा करते हैं। इन्हें टूटता हुआ तारा कहते हैं। यह एक गलत शब्द है, क्योंकि न तो ये तारे होते हैं और न ही कारों से किसी प्रकार से संबंधित होते हैं। ये ग्रहिकाओं के टुकड़े होते हैं। ग्रहिकाओं के कई टुकड़े अपनी कक्षा से भटक कर पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करते हैं। वायु और धूल के कणों से घर्षण के कारण उत्पन्न अत्यधिक ऊष्मा से यह चमकते हुए दिखाई देते हैं जिसे उल्का (meteor) कहते हैं। इनमें से अधिकांश छोटे पिण्ड तो वायुमण्डल में ही नष्ट हो जाते हैं. परन्तु कुछ बड़े पिण्ड पृथ्वी की सतह तक पहुँच जाते हैं और वहाँ टकराकर बहुत बड़ा गड्डा बना सकते हैं। ऐसे बड़े पिण्डों को उल्का-पिण्ड (meteorites) कहा जाता है। इनके रासायनिक विश्लेषण से सौरमण्डल के बारे में ही महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

पुच्छल तारे या धूमकेतु (Comets)-

वे खगोलीय पिण्ड जो अत्यधिक दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में सूर्य की परिक्रमा करते हैं, धूमकेतु कहलाते हैं। वे पृथ्वी से केवल तभी दिखाई पड़ते हैं जब वे सूर्य के बहुत निकट आ जाते हैं। ये आकाश में एक ऐसे चमकते हुए गोले के रूप में दिखाई देते हैं जिसकी एक लम्बी पूँछ होती है। जैसे-जैसे कोई धूमकेतु सूर्य के निकट पहुँचता है इसकी पूँछ की लम्बाई बढ़ती जाती है और फिर सूर्य से दूर होते समय इसकी पूँछ की लम्बाई घटती जाती है और अन्त में अदृश्य हो जाती है। धूमकेतु की पूँछ सदैव सूर्य के विपरीत दिशा में ही रहती है।
कुछ धूमकेतु एक निश्चित समय के बाद बार-बार प्रकट होते रहते हैं। 'हेली' नामक धूमकेतु एक ऐसा ही धूमकेतु है। यह लगभग 76 वर्ष के बाद पृथ्वी से दिखाई देता है। अंतिम बार ने हेली धूमकेतु 1986 ई. में दिखाई दिया था। अतः यह पुनः 1986 + 76 = 2062 ई. में दिखाई देगा।

चन्द्रमा (Moon)-

पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चन्द्रमा है जो निरंतर पृथ्वी की परिक्रमा करता है। चन्द्रमा पर न तो कोई वायुमण्डल है और न ही जल है। आकाश में सूर्य को छोड़कर अन्य सभी खगोलीय पिण्डों की तुलना में चन्द्रमा सबसे अधिक चमकदार दिखाई देता है।
बच्चो आप यह तो जानते ही हैं कि सूर्य एवं अन्य तारे अपना प्रकाश उत्सर्जित करते हैं जबकि चन्द्रमा ऐसा नहीं करता है। हम चन्द्रमा को इसलिए देख पाते हैं क्योंकि यह अपने ऊपर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश को हमारी ओर परावर्तित कर देता है। अतः हम चन्द्रमा का केवल वह भाग देख पाते हैं जो सूर्य प्रकाश द्वारा प्रकाशित है एवं हमारी ओर है।

चन्द्रकलाएँ (Phases of Moon)

जैसा कि हम जानते है चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। अत: सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी एवं चन्द्रमा की स्थिति प्रतिदिन बदलती रहती है जिससे प्रतिदिन पृथ्वी से देखने पर चन्द्रमा का आकार एवं आकृति बदलती प्रतीत होती है।
पूर्णिमा की रात में आप पूर्ण चन्द्र देखते है। इसके बाद चन्द्रमा के चमकदार भाग की आकृति प्रतिदिन घटती जाती है तथा पन्द्रहवें दिन हमें चन्द्रमा नहीं दिखाई देता है। इसे अमावस्या की रात कहते हैं। इससे अगली रात्रि में आकाश में नवचन्द्र प्रकट होता है। इसके बाद के दिनों में चन्द्रमा का चमकदार भाग बढ़ता जाता है और पन्द्रहवें दिन उसका चमकदार भाग पुनः पूर्ण चन्द्र के रूप में दिखाई देने लगता है। चन्द्रमा में चमकदार भाग के घटने बढ़ने के क्रम को चन्द्रमा की कलाएँ कहते हैं।
पृथ्वी के परितः परिक्रमा करते हुए चन्द्रमा की विभिन्न स्थितियों को दर्शाया गया है। पूर्णिमा के दिन पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य के मध्य होती है अतः इस दिन हमें पूर्ण चन्द्रमा दिखाई देता है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य के मध्य होता है, अत: सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा के उस भाग पर पड़ता है जो हमारी ओर नहीं है। अतः हम चन्द्रमा को नहीं देख पाते हैं यद्यपि उसका आधा पृष्ठ सूर्य के प्रकाश द्वारा प्रकाशित होता है। अमावस्या से ठीक अगले दिन पृथ्वी के जिस भाग पर हम हैं, उससे चन्द्रमा का केवल चाप के आकार का (नवचन्द्र) भाग ही प्रकाशित दिखाई पड़ता है। सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित चन्द्रमा का यह दृश्य भाग प्रतिदिन आकार में बढ़ता जाता है और पूर्णिमा को हमें पूर्ण चन्द्रमा पुनः दिखाई देने लगता है। चन्द्रमा पृथ्वी के परित: अपनी एक परिक्रमा 27.3 दिन में पूरी करता है। परन्तु उसी काल में, पृथ्वी अपनी कक्षा में थोड़ी आगे बढ़ जाती है। इसलिए पृथ्वी से देखने पर, किसी अमावस्या की रात से अगली अमावस्या की रात के बीच चन्द्रमा पृथ्वी के परित: एक परिक्रमा पूरी करने में 29.5 दिन का समय लेता हुआ दिखाई पड़ता है। चन्द्र कलेन्डरों का निर्माण इसी आधार पर होता है।

कृत्रिम उपग्रह (Artificial Satellites)-

अब तक आप यह जान चुके है कि ऐसे खगोलीय पिण्ड जो किसी ग्रह की परिक्रमा करते हैं, उपग्रह कहलाते हैं। चन्द्रमा, पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्र है। परन्तु बच्चो आपने टेलीविजन पर कार्यक्रम देखते समय इन्सेट-3B एवं कल्पना -I जैसे उपग्रहों के नाम सुने होंगे। ये कृत्रिम अथवा मानव निर्मित उपग्रहों के उदाहरण है।
मानव निर्मित कृत्रिम उपग्रह भी पृथ्वी के प्राकृतिक उपग्रह चन्द्रमा की भाँति ही पृथ्वी की परिक्रम करते हैं। परन्तु यह चन्द्रमा की तुलना में पृथ्वी के बहुत निकट होते हैं। उपयोग के आधार पर इन ग्र की परिक्रमण कक्षा की पृथ्वी से दूरियों भिन्न-भिन्न हो सकती है।
पहला सफल कृत्रिम उपग्रह रूस द्वारा 1957 में भेजा गया स्मृतनिक-1 था। भारत ने अपना पहल कृत्रिम उपग्रह (आर्यभट्ट) 19 अप्रैल 1975 को अंतरिक्ष में भेजा था। संसार में केवल छः ऐसे देश जिनके पास मानव निर्मित कृत्रिम उपग्रहों को विकसित करने और अंतरिक्ष में पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा हेतु निर्धारित कक्षा में भेजने की तकनीक उपलब्ध है। भारत भी इन छ: देशों में एक है।

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com

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