पौधों में जैविक क्रियाएँ, श्वसन एवं उत्सर्जन | Biological actions, respiration and excretion in plants.

भोजन बनाने की क्रिया पौधों में पाये जाने वाले हरे रंग के पर्णहरिम (क्लोरोफिल) को उपस्थिति के कारण होती है।

पौधों में जैविक क्रियाएँ, श्वसन एवं उत्सर्जन |  Biological actions, respiration and excretion in plants.

पौधों में पोषण

Nutrition in plants

भोजन बनाने की क्रिया पौधों में पाये जाने वाले हरे रंग के पर्णहरिम (क्लोरोफिल) को उपस्थिति के कारण होती है, जो एक वर्णक है, और हरितलवक (क्लोरो प्लास्ट) में पाया जाता है, यह हरितलवक कोशिका दब्य में पाया जाता है।

स्वपोषण

autonutrition

प्रकाश संश्लेषण

photosynthesis

पौधों में भोजन बनाने की किया क प्रकाश संश्लेषण कहते हैं। इसके लिए पौधे मुदा (मिट्टी) से पानी खनिज लवण और वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं। पणहरिम (क्लोरोफिल) सौरऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलता है। इस क्रिया में ग्लूकोज और ऑक्सोजन बनती है तथा ऊर्जा संचित होती है। यह एक जैव रासायनिक क्रिया है। जिसमें बना हुआ ग्लूकोज पौधे के अन्य भाग जड़ तना आदि में स्टार्च के रूप में संग्रहित हो जाता है।
6CO2 + 6H,O प्रकाश / पर्णहरिम प्रकाश C6H1206 + 602
कार्बनडाइ ऑक्साइड + पानी प्रकाश / पर्णहरिम प्रकाश ग्लूकोज + ऑक्सीजन

परपोषण

nurture

वह पोषण जिसमें जीव अपने भोज्य पदार्थ स्वयं नहीं बनाते हैं बल्कि अपना भोजन दूसरे जीवों से प्राप्त करते हैं, ऐसे पोषण वाले जीव परजीवी कहलाते हैं। जैसे- अमरबेल कुछ पौधे सड़ेगले पदार्थों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं, चूंकि ये सड़े-गले या मृत पदार्थों से भोजन लेते हैं इसलिए इन्हें मृतोपजीवी कहते हैं। (जैसे मोनोटापा, फफूंद आदि । इसी प्रकार जब दो जीव एक-दूसरे की मदद करते हुए साथ-साथ जीवन निर्वाह करते हैं तो उन्हें सहजीवी कहते हैं। इसका उदाहरण हम लाइकेन (गरम मसाले में मिलने वाला पत्थर फूल सहजीवी लाइकेन ही है।) में देख सकते हैं। इनमें शैवाल स्वपोषी और फफूंद मृतोपजीवी एक साथ रहते हैं। शैवाल भोजन बनाता है जिसे फफूंद लेता है बदले में फफूंद कोशिकाओं को जकड़ कर रखता है और जल तथा खनिज लवण देता है।
कीटों को खाने वाले जंतुओं के बारे में आपने सुना होगा, छिपकली द्वारा कीटों को खाते हुए भी देखा होगा। पर क्या आपने किसी पौधे को कीड़े खोते देखा है ? आइए हम ऐसे ही पौधे की जानकारी प्राप्त करें। कीटों को के खाने के कारण ही इन्हें कीटभक्षी पौधे कहते हैं। उदाहरण पिचर प्लांद ६ (कलश पादप) इसे घटपर्णी भी कहते हैं, सनड्यू तथा यूटीकुलेरिया भी कीट भक्षी पौधे हैं।
ये कीटों को पकड़ते कैसे हैं-
कीटों को पकड़ने के लिए इन पौधों की पत्तियाँ विशेष आकृति ग्रहण करती हैं। कलश पादप में पत्ती कलश के आकार की हो जाती है। पत्ती का अग्र भाग ढक्कने बनाता है। कलश के अंदर एक चिपचिपा रासायनिक पदार्थ पाया जाता है। कीट जैसे ही इसके ढक्कन के पास आते हैं कलश में गिर जाते हैं और ढक्कन बंद हो जाता है। कलश के अंदर इसका पाचन हो जाता है।

पौधों में श्वसन क्रिया

Respiration in plants

प्रत्येक जीव के समान पौधा में भी श्वसन क्रिया होती हैं।
पौधों में स्वसन के लिए कोई विशिष्ट अंग नहीं होते। इनमें रन्ध्र (स्टोमेटा) व वातरन्ध (लैटोसेल) के द्वारा गैसों का आदान-प्रदान होता है। आप कमरे में अगरबत्ती लगाते हैं। कुछ ही देर में उसकी खुशबू पूरे कमरे में फैल जाती है अर्थात् गैस के अणु जहाँ अधिक थे, वहाँ से उस स्थान की ओर चले गए जहाँ कम अणु थे, इसे हम विसरण क्रिया कहते हैं। ठीक इसी तरह पौधों में गैसों का विसरण होता है। इसके लिए पौधों में पत्तियों के ऊपरी और निचले भाग पर छोटे-छोटे छिद्र पाए जाते हैं इन छिद्रों को रन्ध्र (स्टोमेटा) कहते हैं। इन्हीं रन्ध्रों द्वारा पौधों में गैसों का आदान-प्रदान (गैसों का विनिमय अर्थात् ऑक्सीजन का कोशिका के अंदर आना तथा कार्बन डाइऑक्साइड का बाहर निकलना) होता है। पौधों की कोशिकाओं में भी श्वसन की क्रिया (जैवरासायनिक) जन्तुओं के समान ही होती है। इनमें होने वाली श्वसन अभिक्रिया इस प्रकार है।
ग्लूकोज + ऑक्सीजन – कार्बन डाईऑक्साइड + जल + ऊर्जा
पेड़ पौधों में श्वसन क्रिया दिन एवं रात दोनों समय होती है।

रंन्ध्र (स्टोमेटा)

stomata

पत्ती की निचली सतह पर एक खुला स्थान अथवा रंध्र, जो दो रक्षक कोशिकाओं से घिरा होता है तथा इनके चारों ओर अनेक एपिडरमल कोशिकाएँ होती हैं। अपने चारों ओर स्थित इन कोशिकाओं में जल संचरण के कारण किसी रक्षक कोशिका में प्रसारण, फैलाव अथवा सिकुड़न होता है जिससे रंध्र खुलते अथवा बंद होते हैं। रंध्रों के खुलने व बंद होने की घटना सामान्यतः दिन के समय होती है। ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान करने में रंध्र सहायता करते हैं। आप जानते हैं कि श्वसन की प्रक्रिया में पौधे कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करते हैं। तथापि, पौधों में गैसों के आदान प्रदान अर्थात् विनिमय की दर इतनी तीव्र नहीं होती जितनी जंतुओं में होती है।

पौधों में उत्सर्जन क्रिया

Excretory function in plants

जन्तुओं में गाय, घोड़ा, चिड़िया के उत्सर्जी पदार्थ पसीना, मूत्र, गोबर, लीद, बीट आदि को आप जानते हैं। लेकिन क्या आप पौधों के उत्सर्जी पदार्थों को जानते हैं? पौधा के उत्सर्जी पदार्थ गोंद, रेजिन आदि हैं। ऐसे ही अनेक उत्सर्जी पदार्थ पौधे से निकलते हैं। पौधों में उत्सर्जी अंग नहीं पाए जाते हैं। इनमें तने पत्ती आदि की सतह से ही उत्सर्जी पदार्थ निकलते रहते हैं।
1. रेजिन पौधे से निकलने वाला स्राव है। जिसे पाइनस के पौधे में चीरा लगाकर कप में इकट्ठा किया जाता है। इससे तारपीन का तेल और रेजिन मिलता है।
2. रबड़ के पौधे से रबर निकाला जाता है। रबर-ट्यूब, पाइप जैसी अनेक उपयोगी वस्तुएँ रबर की बनी होती हैं। यह उत्सर्जी पदार्थ हैं।

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