भारत की विदेश नीति एवं पड़ोसी देशों से संबंध | India's foreign policy and relations with neighboring countries

भारत की विदेश नीति का विश्व पर गहरा प्रभाव पड़ा है।भारत का सांस्कृतिक अतीत अत्यंत गौरवपूर्ण रहा है।

भारत की विदेश नीति एवं पड़ोसी देशों से संबंध | India's foreign policy and relations with neighboring countries

भारत की विदेश नीति

भारत की विदेश नीति का विश्व पर गहरा प्रभाव पड़ा है।भारत का सांस्कृतिक अतीत अत्यंत गौरवपूर्ण रहा है। न केवल पड़ोसी देशों के साथ अपितु दूर-दूर स्थित देशों के साथ भी भारत मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए प्रयत्नशील रहा है।भारत की विदेश नीति की जड़ें विगत कई शताब्दियों में विकसित सभ्यताओं के मूल में छिपी हुई हैं और इसमें प्राचीन तथा मध्ययुगीन चिन्तन शैलियों, ब्रिटिश नीतियों की विरासत, स्वाधीनता आंदोलन तथा वैदेशिक मामलों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहुंच, गांधीवादी दर्शन के प्रभाव आदि का प्रभावशाली योग रहा है।

भारत की विदेश नीति के प्रमुख लक्ष्य

1. भारत को विश्व की प्रभावशाली शक्ति बनाना।
2. भारत के औद्योगिक विकास के लिए दूसरे देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त करना।
3. उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद का विरोध करना।
4. एशिया और अफ्रीका के देशों के स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करना।
5. राष्ट्रमंडल के देशों से घनिष्ठ संबंध बनाए रखना।
6. राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करना।
7. वैदेशिक व्यापार के विकास हेतु आवश्यक दशाओं का निर्माण करना।
8. प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा करना।
9. पारस्परिक आर्थिक तथा जनहित के रक्षार्थ एशियाई अफ्रीकी देशों को संगठित करना।
10. संयुक्त राष्ट्र का समर्थन तथा सहयोग करना।
भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्व

1.भौगोलिक तत्व-

भारत की विदेश नीति के निर्धारण में भारत के आकार, एशिया में अपनी विशेष स्थिति तथा दूर-दूर तक फैली सामुद्रिक और पर्वतीय सीमाओं का विशेष स्थान है।भारतीय व्यापार तथा सुरक्षा इन्हीं पर निर्भर है।

2. गुटनिरपेक्षता-

विश्व दो गुटों पूंजीवाद और साम्यवाद में बंटा हुआ था। दोनों में मनमुटाव के कारण शीत युद्ध चल रहा था। भारत ने इन दोनों गुटों से अलग रहकर अपने आपको गुटनिरपेक्ष देश रखा जो दोनों गुटों के मध्य मध्यस्थ का कार्य कर अंतरराष्ट्रीय तनाव को कम करने में सहायता करता है।

3. ऐतिहासिक परम्पराएं-

भारत की विदेश नीति सदैव शांतिप्रिय रही है।भारत की अपनी प्राचीन संस्कृति और इतिहास है।आज तक भारत ने किसी दूसरे देश पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रत्यंत नहीं किया। यही परंपरा वर्तमान विदेश नीति में देखी जा सकती है।

4. राष्ट्रीय हित-

पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था कि किसी भी देश की विदेश नीति की आधारशिला उसके राष्ट्रीय हित की सुरक्षा होती है और भारत की विदेश नीति का ध्येय यही है।

भारत की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धांत

1. गुट निरपेक्षता-

विश्व में शांति व सुरक्षा बनाए रखने के लिए भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई जिसका अर्थ है शक्तिशाली गुटों से दूर रहना। गुट निरपेक्षता की नीति न तो पलायनवादी है और न अलगाववादी बल्कि मैत्रीपूर्ण सहयोग को संभव बनाने की है।

2.साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध-

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अधीन भारत दासता के दुष्परिणाम से परिचित रहा।अतः उसके लिए साम्राज्यवाद का विरोध करना स्वाभाविक था। भारत संयुक्त राष्ट्र में उपनिवेशवाद के विरुद्ध भी आवाज उठाता रहा है। आज भी भारत नव- उपनिवेशवाद के विरुद्ध आवाज उठा रहा है। इण्डोनेशिया,लीबिया,नामीबिया आदि साम्राज्यवाद से त्रस्त देश हैं।

3. नस्लवादी भेदभाव का विरोध-

भारत सभी नस्लों की समानता में विश्वास रखता है। अपनी स्वतंत्रता के पहले भारत दक्षिण अफ्रीका की प्रजाति पार्थक्य नीति के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ में बराबर प्रश्न उठाता रहा है।भारत में जर्मनी की नाजीवादी नीति का भी विरोध किया। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय में नक्सलवाद की पूर्ण समाप्ति भारतीय विदेश नीति का प्रमुख सिद्धांत है।

4. पंचशील-

पंचशील पहली बार तिब्बत के मुद्दे पर 29 मई 1954 को भारत और चीन के बीच हुई संघि में साकार हुआ। पंचशील संस्कृत के दो शब्द पंच और शील से बना है। पंच का अर्थ है पांच और शील का अर्थ है आचरण के नियम अर्थात् आचरण के पांच नियम जो निम्न हैं-
1. एक-दूसरे की प्रदेशिक अखण्डता और संप्रभुता का आदर।
2. अनाक्रमण।
3. एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप।
4. समानता और पारस्परिक लाभ।
5. शांतिपुर सहअस्तित्व।

5. विश्व शांति के लिए समर्थन-

भारत,संयुक्त राष्ट्र के मूल सदस्यों में से है। वह विश्व शांति के लिए कार्य करता है।आई.एल.ओ.,यूनीसेफ,एफ.ए.ओ., यूनेस्को (ILO,UNICEF,FAO,UNESCO) आदि से वह सक्रिय रूप से जुड़ा है। भारत सदैव लोगों के सामाजिक और आर्थिक कल्याण के लिए संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों का पालन करता रहा है।

6. नि:शास्त्रीकरण का समर्थन-

भारत आज भी शास्त्रों की होड़ रोकने का समर्थक है। इसके लिए आवश्यक है कि जो शास्त्र बनाए जा रहे हैं,उन्हें न बनाया जाए और जो बने हैं,उन्हें नष्ट कर दिया जाए। केवल नि:शस्त्रीकरण ही अंतरराष्ट्रीय शांति को सुदृढ़ बना सकता ह‌ै।नि:शस्त्रीकरण से बचाए धन और साधनों के उपयोग से सभी राष्ट्रों का विकास हो सकता है।

7. परमाणु नीति-

भारत परमाणु नीति का युद्ध के लिए प्रयोग करने के विरुद्ध है।भारत, अंतरिक्ष के परमाणुकरण का समर्थन नहीं करता। तथापि वह परमाणु अप्रसार संधि का विरोधी है क्योंकि वह पक्षपात पर आधारित है।

8. सार्क से सहयोग-

दक्षिणी एशियाई राज्यों के साथ भाईचारे के संबंधों का विकास करने के लिए भारत ने सार्क की स्थापना में सहयोग दिया है।सार्क में भारत, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान और मालदीव आदि देश सम्मिलित हैं।
इस प्रकार उक्त सिद्धांतों ने भारत को उसके उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता भी की है तथा भारतीय विदेश नीति को गति भी प्रदान की है।

पड़ोसी देशों से भारत के संबंध

भारत एक विशाल देश है,जिसकी सीमाएं चीन, नेपाल, भूटान, बर्मा(म्यांमार), श्रीलंका और पाकिस्तान से मिलती हैं। भारत के संबंध अपने पड़ोसी देशों के साथ हमेशा एक से नहीं रहे हैं।यदा कदा समस्याएं भी आती रही हैैं। भारत ने इन समस्याओं को सदैव शांतिपूर्ण ढंग से,परस्पर वार्ता से समझाने का प्रयास किया है,इन्हें सुलझाने में वह किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप नहीं चाहता है। देश के आर्थिक विकास और शांति का स्थिरता के लिए पड़ोसी देशों के साथ मित्रता और सहयोग आवश्यक है।

भारत और चीन

भारत और चीन की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से है।दोनों देशों के संबंध हजारों वर्षों पुराने हैं। ईसा से पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक के समय से चीन में बौद्ध धर्म का विकास हुआ। अशोक काल के बाद भारत के अनेक विद्वान चीन गए। चीनी यात्री भी भारत आते रहे, जिनमें फाह्यान और ह्वेनसांग प्रमुख थे।चीनी विद्यार्थी नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने आया करते थे। वर्तमान काल में 1949 में चीन में साम्यवादी क्रांति के परिणामस्वरूप साम्यवादी सरकार स्थापित हुई।भारत ने चीन में साम्यवादी क्रांति का स्वागत किया और चीन की नई सरकार से अच्छे संबंध स्थापित करने की पहल की जो काफी कुछ सफल भी हुई। साम्यवादी चीन को सबसे पहले मान्यता देने वालों में भारत प्रमुख था, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में चीन को सदस्य बनाने में काफी महत्वपूर्ण पहल की।

भारत और चीन ने 1954 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जो पंचशील समझौते के नाम से पूरे संसार में जाना जाता है।पारस्परिक संबंधों को निर्धारित करने वाले इन 5 सिद्धांतों को दोनों देशों ने स्वीकार किया तथा माना गया कि विश्व के अन्य देशों को भी पारस्परिक संबंधों में इनका पालन करना चाहिए।पर कुछ समय बाद चीन ने भारत- चीन सीमा के बहुत बड़े भाग पर अपना दावा प्रस्तुत किया तथा 1962 में भारत पर चीन ने आक्रमण किया।भारत ने चीन के इस आक्रमण का विरोध किया और अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए युद्ध किया। युद्ध के बाद भारत-चीन संबंध तनावपूर्ण हो गए और बहुत समय तक सामान्य नहीं रहे।

युद्ध के लगभग दो दशकों बाद भारत-चीन संबंधों में सुधार के प्रयत्न दोनों ओर से किए गए। दोनों देशों के बीच जो राजनयिक संबंध टूट गए थे, 1976 में उन्हें पुनः स्थापित किया गया।दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने के लिए वार्ताएं प्रारंभ की गईं। वर्तमान में दोनों देशों के बीच अनके आर्थिक,व्यापारिक और राजनीतिक समझौते हुए हैं,पर सीमा विवाद अभी भी भारत-चीन संबंधों में अनसुलझा है,उसे सुलझाने के शांतिपूर्ण प्रत्यंत किए जा रहे हैं।

भारत और नेपाल

नेपाल भारत के उत्तर में स्थित है। अभी तक यह एकमात्र हिंदू राष्ट्र था,पर अक्टूबर 2006 में नेपाल में राजा के विरोध में हुए सत्ता संघर्ष के बाद यह हिंदू राष्ट्र नहीं रहा।भारत और नेपाल की सीमाएं उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड तथा हिमालय के दक्षिणी ढाल पर मिलती हैं। नेपाल के साथ भारत के संबंध परंपरागत हैं। यह प्रसिद्ध है कि नेपाल माता सीता तथा गौतमबुध्द की जन्मस्थली है। पशुपतिनाथ का शिव मंदिर नेपाल में स्थित है,जो भारतीयों का प्रमुख धार्मिक स्थल है।

भारत और नेपाल के राजनीतिक और आर्थिक संबंध भी मजबूत हैं। भारत ने विकास योजनाओं के लिए नेपाल को 8 करोड़ का अनुदान दिया। नेपाल ने 1974 में औद्योगिक व तकनीकी सहयोग बनाने के लिए समझौता किया, इस प्रकार भारत ने नेपाल के सामाजिक और आर्थिक विकास में काफी सहयोग दिया है। भारत ने नेपाल और 204 किलोमीटर लंबे पूर्व-पश्चिम राजमार्ग, जो महेंद्र मार्ग कहलाता है, के निर्माण में 50 करोड़ रुपया नेपाल को दिया। वीर अस्पताल का ब्रह्मा रोगी विभाग भी भारत के सहयोग से बना।1950 में भारत ने नेपाल के साथ व्यापारिक संधि की है। भारत ने नेपाल को समुद्र मार्ग की सुविधा दी है। भारतीय सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल की विशेष स्थिति है। नेपाल चीन और भारत के बीच स्थित है।1950 में भारत-नेपाल के बीच हुई सिंधी के अनुसार भारत, नेपाल को अपनी सुरक्षा के लिए शास्त्र आयातित करने की सुविधा देगा। दोनों देशों के नागरिक स्वतंत्र रूप से एक-दूसरे के देश में आ जा सकते हैं।नेपाल के सामन्तशाही व्यवस्था समाप्त करने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

नेपाल से बहुत से विद्यार्थी भारत में अध्ययन करने के लिए आते रहे हैं।नेपाल में अक्टूबर 2006 में सत्ता परिवर्तन हुआ।इस सत्ता परिवर्तन के परिणामस्वरुप राजा का पद समाप्त कर दिया गया और वहां पूर्ण प्रजातांत्रिक सरकार स्थापित हुई। सत्ता परिवर्तन के बाद भी भारत-नेपाल संबंधों में कोई बदलाव नहीं आया है।

भारत और भूटान

भूटान भारत के उत्तर पूर्व में स्थित छोटा-सा देश है।भूटान के उत्तर में तिब्बत,पश्चिम पूर्व तथा दक्षिण में भारत है।इस देश का क्षेत्रफल लगभग 53 हजार वर्ग किलोमीटर है। यहां की आबादी अधिकांशतः बौद्ध धर्म का पालन करने वाली है।

भारत-भूटान के संबंध वैसे ही परम्परागत हैं, जैसे कि भारत-नेपाल के हैं। प्राचीन इतिहास का यदि अध्ययन करें तो यह बात स्पष्ट होती हैं कि पहले भूटान का एक बड़ा भाग भारत की सीमाओं में ही था और सातवीं शताब्दी तक भारतीय शासक उस क्षेत्र में शासनाध्यक्ष थे।भूटान की धार्मिक पृष्ठभूमि में बौद्ध भिक्षु पद्मसम्भव का विशेष स्थान है। पद्मसम्भव ने ही भूटान की जनता को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। भूटान के लोग इन्हें आज भी अपना गुरु मानते हैं।

भारत-भूटान व्यापारिक और आर्थिक संबंध काफी पुराने हैं। भूटान में रेशमी कपड़ा और सुपारी खरीदी जाती थी। 1910 में सिनचुला संधि’ हुई, इसी संधि के आधार पर भारत-भूटान बने। 1949 में ‘भारत-भूटान संधि’ पुनः हुई, जिसमें यह स्वीकार किया गया कि भूटान की प्रतिरक्षा का दायित्व भारत का है।भूटान के आर्थिक विकास में भारत पूरी तरह सहयोग कर रहा है। सितंबर 1961 में जल टंका नदी के संबंध में भारत-भूटान समझौता हुआ।आज इस नदी पर विद्युत उत्पादन हो रहा है।

भूटान की राजधानी थिम्पू भारत के सहयोग से आधुनिक नगर बनी। भारत ने वहां की सड़कों का आधुनिकीकरण किया। भूटान में भारत ने पेनडेना सीमेंट संयंत्र के लिए 13 करोड़ की आर्थिक सहायता दी।

भारत और पाकिस्तान

पाकिस्तान का निर्माण भारत विभाजन के परिणाम स्वरुप 14-15 अगस्त 1947 की रात्रि में हुआ दोनों देश ऐतिहासिक भौगोलिक सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से सभी बातों के समान है परंतु विभाजन परी रामस्वरूप दोनों देशों के बीच प्रारंभिक समय में तो संपत्ति सीमा में नदी जल वितरण आदि समस्याओं को लेकर विवाद चलते हैं किंतु शीघ्र ही दोनों देशों के बीच राजनीतिक विवाद प्रारंभ हो गए।

कश्मीर को लेकर दोनों देशों के मध्य विवाद पाकिस्तान की स्थापना के कुछ ही दिनों के बाद प्रारंभ हो गया इस विवाद के चलते पाकिस्तान ने 4 बार भारत पर सैनिक आक्रमण भी किया पहली बार अक्टूबर 1947 में सीमावर्ती का बालियों को भड़का कर तथा उन्हें सैनिक सहायता उपलब्ध कराकर कश्मीर पर आक्रमण करवाया दूसरी बार सितंबर 1965 में कश्मीर पर पाकिस्तान ने या पका स्मरण किया तीसरी बार 1971 में बांग्लादेश युद्ध के समय में कश्मीर पर आक्रमण किया चौथी बार 1999 में पुनः पाकिस्तान में कश्मीर पर आक्रमण किया जो कारगिल युद्ध के नाम से मशहूर है चारों आंकड़ों का उद्देश्य शक्ति द्वारा कश्मीर पर अपना अधिकार स्थापित करना था पर चारों बाल भारतीय सेना ने पाकिस्तान द्वारा किए गए आक्रमणों को असफल कर दिया।

पाकिस्तान के प्रति भारत की नीति प्रारंभ से ही शांतिपूर्ण बताओ और समझौतों द्वारा पारस्परिक समस्याओं के सूल जाने की रही है इस दृष्टि से भारत ने राजनीतिक आर्थिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्रों का विस्तार करके कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं दोनों देशों ने समझौतों द्वारा इस दिशा में पहल भी की है संस्कृति के शिष्टमंडल ओं का आदान-प्रदान खेलकूद के क्षेत्र में दोनों देशों में प्रतियोगिताओं का आयोजन और दोनों देशों के पत्रकारों और लेखकों द्वारा एक दूसरे के देश में आना-जाना प्रारंभ हुआ है दोनों देशों की जनता एक ही रही है अनेक परिवार दोनों देशों में बसे हैं विवाह संबंध भी दोनों देशों में है जनता के स्तर पर आवागमन की दृष्टि से दोनों देशों में समझौते किए हैं तथा कई सड़क और रेल यातायात जो वर्षो से बंद पड़े थे अब खोल दिए गए हैं दोनों देशों में आर्थिक और व्यापारिक समझौते भी हुए हैं दोनों देश सार्क और सपाटा के सदस्य हैं भारत और पाकिस्तान के रिश्ते दोस्ती और तनाव के रहे हैं पाकिस्तान के कई कार्यो को भारत पसंद नहीं करता पाकिस्तान आतंकवादी को प्रशिक्षण सहायता राशि उपलब्ध कराता रहा है भारत के कई आतंकवादी पाकिस्तान में शरण लिए हुए हैं जिनकी सूची भी भारत ने पाकिस्तान को उपलब्ध कराई है तथापि पाकिस्तान इन्हें भारत को सौंप नहीं रहा है।

पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और संयुक्त राष्ट्र के मंच पर सदैव भारत की आलोचना कराता रहा है तथा कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है।भारत भी पाकिस्तान के द्वारा इन प्रयत्नों का विरोध करता रहा है।

दोनों देश आणविक शक्ति हैं।दोनों देशों का सम्मिलित रूप से विश्व शांति के लिए कार्य करना आवश्यक है।भारत ने इस दिशा में पहल की है।

भारत और बांग्लादेश

1947 के भारत विभाजन के परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान के रूप में (बांग्लादेश) पाकिस्तान का भाग था।शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश के लोगों ने पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति के लिए आंदोलन किया और अंततः 1971 में इस आंदोलन को सफलता मिली और स्वतंत्र बांग्लादेश अस्तित्व में आया। भारत ने बांग्लादेश की स्थापना में ऐतिहासिक सहयोग दिया।भारत-बांग्लादेश को मान्यता देने वाला पहला देश था। बांग्लादेश की स्थापना के बाद भारत ने बांग्लादेश को आर्थिक संकट, भुखमरी बेरोजगारी आदि से निपटने के लिए पूरी सहायता दी। जनवरी 1972 में भारत ने 25 करोड़ के खदान्न तथा अन्य वस्तुएं और 50 लाख पौण्ड की विदेशी मुद्रा ऋण के रूप में प्रदान की। मार्च 1972 में दोनों देशों के बीच 25 वर्षीय मैत्री संधि हुई जो ऐतिहासिक थी। दोनों देशों के बीच व्यापारिक, आर्थिक समझौते भी हुए तथा संयुक्त नदी उद्योग स्थापित किया गया।

भारत बांग्लादेश के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद भी हैं। फरक्का बांध समस्या उनमें से एक है‌।इसके अलावा घुसपैठियों की समस्या भी समस्या भी प्रमुख है।घुसपैठ के कारण भारत के सम्मुख सुरक्षा की समस्या उत्पन्न हो गई है।चकमा आदिवासियों तथा दोनों देशों की सीमा पर कांटेदार बागड़ लगाने के मामले में मतभेद हैं। नया मुद्दा बांग्लादेश से भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देना भी है।भारत-बांग्लादेश से अच्छे संबंध बनाने के लिए सदैव तत्पर रहा है।

भारत और श्रीलंका

भारत के दक्षिण में चारो ओर समुद्र से घिरा श्रीलंका भारत का महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है।भारत से श्रीलंका के घनिष्ठ संबंधों का इतिहास बहुत पुराना है।भगवान राम और उनके बाद सम्राट अशोक के काल में भारत-श्रीलंका संबंध प्राचीन इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी है।अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका की यात्रा की थी, तभी से श्रीलंका प्रमुख बौद्ध धर्मावलंबी देश है।

श्रीलंका भी भारत के समान विदेशी साम्राज्यवादियों का शिकार बना था। यहां पुर्तगाली, डच और बाद में ब्रिटिश शासन रहा। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद फरवरी 1948 को यह स्वतंत्र राज्य बना भारत ने श्रीलंका का स्वतंत्रता, प्रभुता और प्रदेशिक अखंडता का सम्मान करने का घोषणा की।स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी श्रीलंका ने त्रिंकोमारी का नौ सैनिक अड्डा तथा कटुनायके का हवाई अड्डा ब्रिटेन के नियंत्रण में रहने दिया।

बहुत से भारतीय नागरिक विशेषत: तमिलनाडु के लोग श्रीलंका जाकर बस गए हैं तथा वहां चाय और रबड़ से बागानों में कार्य करते हैं।श्रीलंका के साथ भारत के अच्छे व्यापारिक संबंध है। राजनीति के क्षेत्र में भी भारत-श्रीलंका के साथ पारस्परिक सहयोग और सहायता की नीति का अनुसरण करता रहा है। यघपि भारत-श्रीलंका संबंध घनिष्ठ और सुदृढ़ हैं, तथापि दोनों देशों के बीच कुछ समस्याएं भी हैं। दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करने वाली सबसे बड़ी समस्या है,श्रीलंका में बसे भारतीय मूल में के रहने वालों की। ये भारतीय मूल के निवासी ब्रिटिश शासन काल से ही रबर और चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका जाते रहे हैं और वहां बसते रहे हैं।प्रारंभिक काल में तो कोई समस्या नहीं थी पर श्रीलंका के स्वाधीन होने के बाद श्रीलंका नागरिकता नियम 1948 तथा श्रीलंका संसदीय नियम 1949 के द्वारा अधिकांशतः प्रवासी भारतवंशियों को नागरिकता और मताधिकार से वंचित का दिया गया।

हाल के कुछ वर्षों में श्रीलंका में उत्पन्न जातिय संघर्ष भारत के लिए चिंता का कारण बन गया है। श्रीलंका में बसे तमिल, अल्पसंख्यक समुदाय हैं। अधिकांश तमिल श्रीलंका के उत्तर में जाफना जिले में रहते हैं। श्रीलंका में तमिल लोगो का बहुत बड़ा वर्ग पृथक तमिल राज्य की मांग करता रहा है।यही तमिल समस्या है।तमिल समस्या के कारण भारत श्रीलंका में तनाव की स्थिति बनी है‌।समस्या को सुलझाने के लिए भारत ने कई प्रकार से सहायता की है।जुलाई 1987 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के अंतर्गत भारत ने श्रीलंका को अंतरिक जातीय समस्या को सुलझाने के लिए ‘भारतीय शांति सेना’ भेजकर सहायता दी थी।

भारत और म्यांमार (बर्मा)

म्यांमार (बर्मा) भारत की पूर्वी सीमा पर स्थित पड़ोसी देश है। भारत के म्यांमार से परंपरागत मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं‌।दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए समझौते किए गए हैं। दोनों देशों के बीच तस्वीर की समस्या अवश्य है।अवैध रूप में सीमाओं को पार करने की घटनाएं होती रही हैैं। 1987 में जब भारत के प्रधानमंत्री म्यांमार गए थे, उस समय भारत के और म्यांमार के बीच नशीले पदार्थों की तस्करी तथा अवैेध कार्यों को नियंत्रण करने में एक-दूसरे के साथ पूर्ण सहयोग करने का संकल्प किया था। वर्तमान में भारत म्यांमार संबंध सामान्यतः मैत्रीपूर्ण हैं।

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आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com

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