जलवायु शब्द किसी स्थान विशेष मे कई वर्षों में मौसम के सामान्य औसत स्वरूप का वर्णन करता है। किसी स्थान की जलवायु का निर्धारण करने के लिए मौसम वैज्ञानिकों को आमतौर पर 30 वर्षों के अध्ययन की जरूरत महसूस होती है।
पृथ्वी की जलवायु सूर्य वायुमण्डल, समुद्र, भूमि और जैव मण्डल की जटिल पारस्परिक क्रियाओं का परिणाम है। पूर्व में हिम युग से आज के औद्योगिक युग तक पृथ्वी की जलवायु परिवर्तित होती रही है। लाखों वर्षों से वैज्ञानिक पृथ्वी की जलवायु का अध्ययन कर लेखा जोखा रखते रहे हैं। उन्होंने पाया है कि भूगर्भीय समय में इस ग्रह का औसत सतही तापमान कम-ज्यादा होता रहा है। गौरतलब है कि विगत 800,000 वर्षो में कई हिम युग आए।
परिवर्तन पर्यावरण का विशिष्ट लक्षण है। कुछ परिवर्तन जल्दी तो कई अन्य हजारों वर्षों में होते हैं। प्रत्येक परिवर्तन का प्रभाव सम्पूर्ण प्रणाली (तंत्र) पर तथा उसके अवयवों पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के पीछे प्राकृतिक एवं मानव जनित दोनों ही कारण है। अधिकांश प्राकृतिक परिवर्तनों का स्वरूप नियमित होने के कारण इनका क्रम की भविष्यवाणी की जा सकती है। भूतकाल के हिम युग प्राकृतिक कारकों से होने वाले जलवायु परिवर्तन के उदाहरण है। मानव जनित कारकों से होने वाले परिवर्तन न केवल काफी बड़े अधिक गंभीर और जलवायु पर एकाएक प्रभाव डालने वाले होते हैं बल्कि बहुत तेजी से भी होते हैं (यहाँ तक की दशकों में)।
जलवायु में परिवर्तन प्राकृतिक होते हैं। किन्तु चिन्ता का विषय यह है कि इस प्रकार के परिवर्तन मानवीय गतिविधिया के कारण अप्रत्याशित तेजी आ रही है। वैज्ञानिकों का मत है कि सन 2050 तक विश्व औसतन 1.5 डिग्री सेल्सियस से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच और अधिक गरम हो जाएगा। इतने तेज परिवर्तन के पीछे कई कारण है। जीवाश्म ईंधन के जलने और बनों के कटने जैसी मानवीय गतिविधियों के परिणामस्वरूप वातावरण में कुछ गैसों की मात्रा में वृद्धि इसके कुछ उदाहरण है। इन उत्सर्जना में लगातार वृद्धि के कारण जलवायु में अप्रत्याशित परिवर्तन होने की आशंका है। पृथ्वी के इस प्रकार गर्म होने की ही ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती का गरमाना कहते है। और इस तपन में योगदान देने वाली क्रा को ग्रीन हाऊस प्रभाव कहा जाता है।
ग्रीन हाऊस प्रभाव
सामान्यत पृथ्वी की सहत सूर्य की कुछ किरणों को अवशोषित कर गर्म हो जाती है और कुछ ऊष्मा परावर्तित होकर वायुमण्डल में चली जाती है। वायुमण्डल में प्राकृतिक रूप से उपस्थित कुछ गैसे इस ऊष्मा में से कुछ को अवशोषित कर लेती है और वापस अन्तरिक्ष में नहीं जाने देती। इससे पृथ्वी की सतह गर्म हो जाती है और ट्रोपोस्फियर का तापमान पर्याप्त रूप से बढ़ जाता है। इस तरह हमारे वायुमण्डल में तापमान उस वांछित सीमा के बीच बना रहता है जो जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। यदि मण्डल प्राकृतिक रूप से न पाई जाती तो पृथ्वी वर्तमान से नहीं अधिक पृथ्वी होती और जीवन जैसा हम पाते हैं वैसा नहीं होता।
ऊष्मा का अवशोषण करने वाली गैसे है–
कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, ओजोन तथा सी. एफ. सी। इनमें से कुछ प्राकृतिक रूप से पाई जाती है तो कुछ मानव जनित है। इन्हें ग्रीन हाऊस गैसे कहा ग्रीन हाउस प्रभाव में भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन है क्योंकि ये एक ग्रीन हाऊस के कौंच के समान कार्य करती है। पृथ्वी की सतह द्वारा अवशोषित ऊष्मा हो सकता है कर ली जाती है। और यह वापिस अन्तरिक्ष में नहीं जा पाती है। ताप का इस प्रकार ट्रोपोस्फियर म रोक लिया जाना ग्रीन हाऊस प्रभाव कहलाता है।
पृथ्वी के वायुमण्डल में ग्रीन हाऊस गैसों की मात्रा पर ही भूमण्डलीय जलवायु निर्भर करती है। इन गैसों की मात्रा में पर्याप्त कमी या बढोत्तरी होने पर उसके अनुरूप ही हमारी जलवायु परिवर्तित होती है।
आज वे मानवीय गतिविधियों जिनके कारण ग्रीन हाऊस गैसे निकलती है में काफी वृद्धि हो रही है। वाहन और औद्योगिक प्रदूषण के कारण कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाई ऑक्साइड इत्यादि वायुमण्डल में मिल रही है। साथ ही ग्रीन हाऊस गैसों का कार्य करने वाले सी एफ सी. जैसे कुछ मानव जनित रसायने भी वातावरण में छोड़े जा रहे हैं।
इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी के तापमान में हो रही धीमी बढ़ोत्तरी को ग्लोबल वार्मिंग या धरती का गरमाना कहा जाता है।
ग्रीन हाऊस गैसें
कार्बन डाईऑक्साइड:
ग्रीनहाऊस गैसों के कारण धरती के तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी का लगभग 55 प्रतिशत मानव जनित कार्बन डाईऑक्साइड के कारण होता है। यह वायुमण्डल में औसतन लगभग 500
वर्षों तक रहती है। औद्योगिक क्रांति के बाद कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों के दहन के फलस्वरूप कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वनो को जलाकर नष्ट करने से भी कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा होती है। वनस्पतियाँ प्रकाश संश्लेषण के लिए CO2, सोखती है और ऑक्सीजन
(O2) छोड़ती है। इससे CO2, में कमी आती है।
मीथेन
ग्रीन हाऊस गैसों में वृद्धि का लगभग 18 प्रतिशत भाग मीथेन ( CH4) का है। प्रत्येक मीथेन अणु कार्बन डाई ऑक्साइड के एक अणु की तुलना में 25 गुना ज्यादा ऊष्मा सोखता है। यह गैस वायुमण्डल मे लगभग 7-10 वर्षों तक रहती है। मीथेन मुख्यतः जीवन की प्रक्रियाओं के फलस्वरूप ही वायुमण्डल में मिलती
है। इन प्रक्रियाओं में शामिल हैं पशुओं विशेषतः गाय बैलों की आत में मीथेन उत्पादक बैक्टीरिया की सक्रियता धान के खेत नम-भूमि (वेटलैण्ड), कचरे के ढेरों आदि में पाए जाने वाले बैक्टीरिया आदि एक तिहाई मनुष्यों की आतों में भी मीथेन उत्पादक बैक्टीरिया होते हैं मीथेन की वृद्धि विश्व की जनसंख्या में
हो रही वृद्धि से जुड़ी है क्योंकि अधिक लोगों को अधिक गाय-बैलों की आवश्यकता होती है। मीथेन का सबसे बड़ा कृषि खोत धान की खेती से जुड़ा है। धान के खेतों में प्रतिवर्ष अनुमानत 250 से 1700 लाख टन मीथेन निकलती है। शहरी मिश्रित अपशिष्टों से जमीन के राव की मात्रा पैदा होती है। इसके अलावा अनाक्सी पाचन विधि से होने वाले सीवेज उपचार सत्र में भी भवन बनती है। बेहतर अपशिष्ट प्रबन्धन व्यवहारों से शहरी क्षेत्रों में जैविक अपशिष्टों का इस्तेमाल में गौधन बनाने में किया जा सकता है। यह गैस खाना पकाने और पानी गरम करने में उपयोग में लाई जा सकती है।
क्लोरोफलोरोकार्बन ( सी.एफ.सी.)
ग्रीन हाऊस गैसौ में होने वाले इसानी योगदान के 24 प्रतिशत के लिए सी एफ सी जिम्मेदार है। यह पूर्ण रूप से मानव जनित ग्रीन हाऊस गैस है। रेफ्रिजरेटरी तथा एयर कंडीशनरों के कम्प्रेशर में इनका उपयोग शीतलक के रूप होता है। कई परफ्यूम और रूम फ्रेशनर की बोतलों में सी एफ सी का इस्तेमाल होता है। कम्प्यूटर फोन इत्यादि के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बोर्ड को साफ करने में भी सी एफ सी का उपयोग होता है। सी. एफ. सी. वायुमण्डल में 60 से 130 वर्ष तक बनी रह सकती है। इस दौरान ट्रोपोस्फियर में यह कार्बन डाई ऑक्साइड की तुलना में प्रति अणु 1500-7000 गुना ज्यादा ऊमा रोकती है।
नाइट्रस ऑक्साइड NO
ग्रीन हाऊस गैसों के मानवीय योगदान में 67 प्रतिशत नाइट्रस ऑक्साइड छद्र होता है। नायलाॅन उत्पादन, बायोमास एवं कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों के जलने मिट्टी में नाइट्रोजन उर्वरकों के विखंडन, पशु अपशिष्ट तथा नाइट्रेट प्रदूषित भू-जल आदि से नाइट्रस ऑक्साइड निकलती है। वायुमण्डल के ट्रोपोस्फियर
में इसका जीवनकाल 140-190 वर्ष होता है तथा कार्बन डाई ऑक्साइड की तुलना में यह प्रति अणु 230 गुना ज्यादा ऊष्मा को बाँधती है। प्राकृतिक और मानव जनित उर्वरकों से डीनाइट्रीफिकेशन (मिट्टी में नाइट्रेट की कमी) द्वारा नाइट्रेट ऑक्साइड छोड़ी जाती है।
ओजोन परत एवं इसका क्षरण
ओजोन की पृथ्वी के वायुमण्डल में प्राकृतिक रूप से अल्प मात्रा में पाई जाती है। यह दो क्षेत्रों में मिलती है। एक ऊपरी वायुमण्डल (स्ट्रेटोस्फियर) में ओज़ोन अणुओं की एक पतली परत के रूप में यह जगह पृथ्वी की सतह से 17-48 कि.मी ऊपर है। यह ओजोन परत कहलाती है। वायुमण्डल की कुल ओजोन का 90 प्रतिशत स्ट्रेटोस्फियर में होता है। दूसरे, ओजोन की कुछ मात्रा निचले वायुमण्डल (ट्रोपोस्फियर) में भी मिलती है।
उपस्थिति की जगह के आधार पर ओजोन अच्छी या बुरी होती है। स्ट्रेटोस्फियर में यह एक सुरक्षात्मक परत के रूप में पृथ्वी को पराबैंगनी विकिरण से बचाती है। ट्रोपोस्फियर में ओज़ोन हानिकारक प्रदूषक के रूप में कार्य करती है और कभी-कभी फोटो रासायनिक धुध का कारण भी बनती है। ट्रोपोस्फियर में ओजोन की अल्प मात्रा से भी हमारे फेफडो, ऊतकों तथा पौधों को हानि पहुँचाती है। यह एक ग्रीन हाऊस गैस भी है व ग्रीन हाऊस प्रभाव भी दिखाती है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन में भी इसकी भूमिका है।
भौगोलिक और मौसमी परिस्थिति के अनुसार वायुमण्डल में ओजोन की औसत कुल मात्रा भिन्न भिन्न होती है। दोनो गोलाद्धों में ध्रुवों की ओर इसकी मात्रा अधिक जबकि मध्य रेखा पर कम होती है। ओजोन की मात्रा में थोड़े-थोड़े उतार-चढ़ाव सदैव होते रहते हैं। मौसम बदलती वायु दिशा तथा अन्य प्राकृतिक कारणों का इस पर प्रभाव पड़ता है। प्रकृति ने करोड़ों सालों से एक नाजुक संतुलन स्थापित किया हुआ है। किन्तु आज मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप ओजोन परत को हानि पहुँच रही है। इससे ऊपरी वायुमण्डल में ओजोन की कमी हो रही है। यही कमी "ओजोन क्षरण" कहलाती है। जिन रसायनों के कारण यह कमी होती है, उन्हें ओजोन क्षरण कारक तत्व कहते हैं।
ओजोन क्षरण के कारण हानिकारक पराबैंगनी किरणे निचले वायुमण्डल तक पहुँचती है। इस विकिरण से जीवों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा। फलस्वरूप हमारी प्रतिरोधात्मक क्षमता में कमी आ सकती है जिससे हम जल्दी बीमार हो सकते हैं। पराबैगनी विकिरण से त्वचा का कैंसर तथा आँखों को नुकसान पहुँच सकता है।
ओजोन क्षरण का प्रभाव पूरे विश्व में पड़ेगा, हालांकि पृथ्वी के कुछ हिस्से इससे गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण अमरीका के कुछ हिस्से जहाँ औजोन की परत में क्षरण हो चुका है, विश्व के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक जोखिम की स्थिति में है।ओजोन क्षरण के प्रभाव
मनुष्य और पशु–
इनमें त्वचा कैंसर की दर त्वचा में झुर्रियों और जल्द बुढ़ापा आने की दर बढ़ सकती है। साथ ही मोतियाबिन्द एवं आँखों की अन्य बीमारियों में वृद्धि हो सकती है। मनुष्यों में बीमारी से लड़ने
की क्षमता भी कम होगी।
पेड़-पौधे–
बड़े हुए पराबैगनी विकिरण के कारण पत्तियों के आकार में कमी और पेड़ों के अंकुरण में अधिक समय लग सकता है। इससे मक्का, चावल, सोयाबीन, मटर तथा गेहूँ की उपज में कमी आ सकती है।
खाद्य श्रृंखला–
समुद्र की सतह के काफी नीचे तक पराबैंगनी विकिरण पहुँचने के कारण सूक्ष्म जलीय वनस्पतियों की वृद्धि अवरुद्ध हो सकती है। ये छोटी-छोटी बहती वनस्पतियों समुद्री खाद्य श्रृंखला और खाद्य-जाल का आधार हैं और वायुमण्डल की कार्बन डाई ऑक्साइड को कम करने में मदद करती है।
पदार्थ–
पराबैगनी विकिरण में वृद्धि के कारण रंगों और वस्त्रों को नुक्सान पहुँचता है। इससे वे जल्दी फीके पड़ जाते हैं। प्लास्टिक पाइप इत्यादि सूर्य के प्रकाश में जल्दी नष्ट होते हैं।
ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थ
ओजोन अणुओं को नष्ट करने वाले पदार्थ ओजोन को नुकसान पहुंचाते। यह सभी मानव जनित है।
सी.एफ.सी (क्लोरो फ्लोरो कार्बन)
एक ग्रीन हाउस गैस के रूप में हम सी एफ सी के बारे में पहले ही पढ़ चुके हैं। यह ओजोन को सरण करने वाला पदार्थ है। सी. एफ. सी. एक शक्तिशाली ओजोन नाशक पदार्थ है। पृथ्वी पर मानवीय गतिविधियों से बनने के बाद में धीरे-धीरे स्ट्रेटोस्फियर में पहुंचते है जहाँ बैगनी विकिरण के उच्च प्रभाव से विखंडित होकर क्लोरीन परमाणु मुक्त होकर वायुमण्डल में मिल जाते है। ये ओजोन (0) अणुओं को तेजी से ऑक्सीजन अणु (O) और ऑक्सीजन परमाणु (O) में विघटित करते है। एक सी. एफ.सी अणु उत्प्रेरक श्रृंखला-क्रियाओं द्वारा 1 लाख ओजोन अणुओं को विखंडित कर सकता है।
हर बार पॉलिस्ट्रीन का एक कप फेंकने पर हम स्ट्रेटोस्फियर में एक बिलियन सीएफसी के अणु जोड़ रहे होते हैं। ये ओजोन के 100 ट्रिलियन अणुओं को नष्ट कर सकते हैं। सीएफसी ओजोन की परत को साधे नष्ट करके ऊपरी वायुमण्डल में क्लोरीन के वाहक के रूप में काम करती है।
हैलोन–
इनकी रचना सीएफसी के समान होती है किन्तु इनमें क्लोरीन के स्थान पर ब्रोमीन के परमाणु होते हैं। ये ओजोन के लिए सीएफसी से भी अधिक हानिकारक होते हैं। इनका उपयोग अग्निशामक एजेण्ट रूप में होता है। ब्रोमीन का एक परमाणु क्लोरीन के परमाणु की तुलना में ओजोन के कई सौ गुना अधिक ओं को नष्ट करता है।
कार्बन टेट्राबलोराइड (CCI4)–
इनका उपयोग कपड़े और धातुओं की सफाई तथा टाइप या लिखे
अक्षरों को बैंकने के लिए इस्तेमाल होने वाले सफेद द्रव के एक घटक के रूप में चिपकाने वाले स्प्रे ड्राईक्लीनिंग स्प्रे अग्निशामक आदि में किया जाता है। ये भी ओजोन को हानि पहुंचाने वाला पदार्थ है।
भारत तथा ओजोन समस्या
ओजोन समस्याओं के प्रति भारत की चिन्ता बड़ी है। इसने 1992 में मॉन्ट्रियल संधि पर हस्ताक्षर किए है। ओजोन का क्षरण करने वाले पदार्थों को धीरे-धीरे कम करने के लिए देशों में कुछ गंभीर कदम भी उठाए गये हैं। इसके अंतर्गत ओजोन क्षरण करने वाले हानिकारक पदार्थों के व्यापार पर प्रतिबंध लगाया गया है. इनके आयात और निर्यात पर लायसेस लगाया है और ऐसे नए पदार्थों के बनने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
विकसित और औद्योगिक देशों में सी.एफ.सी. की भारी मात्रा का उत्पादन और इस्तेमाल होता है। भारत जैसे विकासशील देश में सी. एफ. सी की खपत काफी कम है। यह 01 कि.ग्रा. प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष है, जबकि अमरीका में यह पचास गुना अधिक है। इस प्रकार ओजोन क्षरण में हमारा बहुत कम हाथ है। भारत जैसे गरम देश में शीतलन और वातानुकूलन एक आवश्यक चीज है। इनका उपयोग खाद्य पदार्थ दवाइयों तथा टीकों को सुरक्षित रखने में किया जाता है।
इसके बावजूद ओजोन क्षरण एक विश्वव्यापी समस्या है और इसका हल सहयोग के द्वारा संभव है। इस बात को ध्यान में रखकर भारत ने मॉन्ट्रियल संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। हमारा सदैव यह मत रहा है कि ऐसे समझौते स्पष्ट तथा सभी पक्षों के लिए समानता पर आधारित होने चाहिए। उदाहरण के लिए विकासशील देश ओजोन स्नेही पदार्थों की खोज और शोध पर अधिक धन खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं, न ही वे वित्तीय हानि उठाकर मौजूदा तकनीक को बदल सकते हैं। इसलिए इन देशों के लिए बिना आर्थिक व तकनीकी सहायता के वैकल्पिक पदार्थों, तकनीकों और विधियों को अपनाना संभव नहीं है।
आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com
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