320 वर्षों के सल्तनत काल में मुस्लिम शासकों ने अपनी परंपरा और आवश्यकतानुसार प्रशासन व्यवस्था में अनेक परिवर्तन किए। इसी प्रकार भारतीय समाज और संस्कृति (भाषा साहित्य, वास्तुकला व धर्म आदि) में भी मुस्लिमों के सतत् संपर्क से अनेक परिवर्तन सामने आए।
प्रशासनिक व्यवस्था
h3>administrative systemसुल्तान की शक्ति सर्वोच्च होती थी। उसे ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। सत्तारूढ़ होने पर सुल्तान के नाम का 'खुतबा' पढ़ा जाता था तथा उसके नाम के सिक्के जारी किए जाते थे। प्रशासनिक कार्यों में वजीर, उलेमा (धर्मशिक्षक) और अमीरों का सहयोग महत्वपूर्ण था। केन्द्रीय शासन के चार महत्वपूर्ण विभाग थे।
(अ) राजस्व तथा लोक प्रशासन
(ब) सैन्य विभाग
(स) राजकीय पत्र व्यवहार
(द) शिक्षा और अनुदान
इन विभागों के अधिकारियों को क्रमशः दीवान-ए-विजारत, दीवान-ए-अर्ज, दीवान-ए-ईशा और दीवान-ए रिसालत कहा जाता था। राज्य सूबों में और सूबे शिको में, शिक परगनों (जिलों) में बंटे हुए थे। सूबे का प्रमुख वली या मुफ्ती, शिक का प्रमुख शिकदार और परगने का मुखिया आमिल कहलाता था।
तेरहवीं शताब्दी में सुल्तानों ने राज्य को सैनिक क्षेत्रों में विभाजित किया था। इन्हें इक्ता कहा जाता था। इसका मुख्य अधिकारी इक्तादार कहलाता था। इक्ता प्रणाली का प्रारंभ इल्तुतमिश द्वारा किया गया था।
सामाजिक जीवन
social life
(1) समाज में मुख्यतः हिन्दू और मुस्लिम जनसंख्या निवास करती थी। समाज मे उच्च वर्ग के लोग (अमीर व सरदार) सुल्तानों का अनुकरण करते हुए विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे।
(2) ब्राह्मण और उलेमाओं (धर्मशिक्षक) का समाज में महत्वपूर्ण स्थान था।
(3) जाति व्यवस्था का पालन कठोरता से किया जाता था। स्त्रियों की स्वतंत्रता बहुत सीमित हो गई थी और पर्दा प्रथा का चलन बढ़ता जा रहा था।
(4) समाज में बाल विवाह, बहु-विवाह, सती प्रथा का प्रचलन था।
(5) मुस्लिम सुल्तानों में दास (गुलाम) प्रथा का प्रचलन था, उनके पास बड़ी संख्या में दास होते थे। कहा जाता है कि फिरोजशाह तुगलक के पास 1,80,000 गुलाम थे।
मोरक्को के यात्री इनवतूता ने अपने वर्णन में हिन्दुओं द्वारा किए जाने वाले 'आतिथ्य-सत्कार' की प्रशंसा की है।
आर्थिक व्यवस्था
Economic System
(1) सल्तनत काल में ग्रामीणों के आर्थिक जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया, इनका मुख्य व्यवसाय (पूर्व की तरह) कृषि था।
(2) नगरों में व्यापार बहुत उन्नति कर रहा था। भड़ौच, खंभात, मुल्तान, लखनौती, सुनारगाँव आदि प्रमुख नगर व बंदरगाह थे।
(3) शिल्पकार अपने शिल्प के अनुसार नगर के अलग-अलग भागों में रहते थे। जैसे सारे सुनार एक बस्ती में, लुहार एक बस्ती में व जुलाहे एक वस्ती में रहते थे।
(4) वस्तुओं को हाट-बाजारों के माध्यम से खरीदा व बेचा जाता था। दिल्ली व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। जहाँ देश के विभिन्न भागों से सामान आता था।
(5) भारत में जल-थल दोनों मार्गों से विदेशी व्यापार पनप रहा था।
निर्यात की मुख्य वस्तुएँ- सूती व रेशमी कपड़ा, जड़ी-बूटी, धातु के बर्तन, हाथी दाँत की वस्तुएँ आदि। काँच के बर्तन, व घोड़ों का आयात किया जाता था।
(6) राज्य की आय का मुख्य साधन भूमि कर था, जो उपज का 1/2 या 1/3 भाग था। इसके अतिरिक्त चुंगीकर, सिंचाई कर, खनिज संपत्ति, मकान कर, तीर्थ यात्रा कर आदि राज्य की आय के अन्य साधन थे।
1. हिन्दुओं और अन्य गैर मुस्लिमों से जजिया कर और मुसलमानों से जकात नामक कर लिया जाता था।
2. इब्नबतूता ने दिल्ली का वर्णन करते हुए लिखा है कि दिल्ली सबसे अधिक सुन्दर नगर था। ने देश के सभी भागों से दिल्ली नगर में सामान आता था।
3. सुल्तानों द्वारा चांदी के टंके व तांये की दरहम नामक मुद्रा चलाई गई।
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