मृदा निर्माण की प्रक्रिया | soil formation process

मृदा भूपर्पटी की ऊपरी सतह पर पाया जाने वाला असंगठित पदार्थ है।

मृदा निर्माण की प्रक्रिया | soil formation process

मृदा (soil)

मृदा भूपर्पटी की ऊपर की सतह पर पाया जाने वाला बिना ताल मेल वाला पदार्थ है। तथा इसके निर्माण उच्चावच एवं वर्षा, जलवायु, ताप एवं आर्द्रता आवश्यक निभाते हैं।
मृदा के निर्माण में निम्न दो प्रकार के कारक भाग लेते हैं।
जो आवश्यक चट्टान के अपक्षय तथा वनस्पति एवं सूक्ष्म जीव से बने ह्यूमस का योग होता है।

1. निष्क्रिय कारक–

इसके अंतर्गत आते हैं–
1.चट्टान
2. उच्चावच
3. समय
4. मूल।

2. सक्रिय कारक–

इसके अंतर्गत आते हैं–
1.वनस्पति
2. सूक्ष्मजीव
3. जलवायु

मृदा निर्माण की प्रक्रिया को तीन भागों में बाटा गया है –
अ. पदार्थों का रूपांतरण
ब. मृदा संवृद्धि
स. पदार्थों का स्थानांतरण।
अ. पदार्थों का रूपांतरण– इसके अंतर्गत चन्ट्टान का अपघटित होना तथा ह्यूमर का निर्माण होना।
ब. मृदा संवृद्धि– अर्थात इसके अंतर्गत जैविक और अजैविक पदार्थों का आपस में मिलना।
स. पदार्थों का स्थानांतरण– इसके अंतर्गत पदार्थों का स्थानांतरण निम्न प्रकारों से होता है–
1.अपवहन
2. केसिका क्रिया
3. विनिक्षेपण
4. लवणीकरण
5. ग्लेइंग
6. निच्छालन या लेटराइजेशन तथा लीचिंग।
1. अपवहन–
अपवहन में पवन द्वारा मृदा के छोटे कणों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण अपवहन कहलाता है।
2. केसिका क्रिया–
एसी का किराया जिन क्षेत्रों में वर्षा न्यूनतम एवं वाष्पीकरण अधिक होता है, वहां मृदा की नीचे की परत के खनिज तत्व घुलकर मृदा की ऊपर की परत में आ जाते हैं तथा वाष्पीकरण के बाद मृदा की ऊपरी परत में खनिज तत्वों की एक परत जम जाती है।
3. विनिक्षेपण–
विनिक्षेपण में वर्षा जल के द्वारा मृदा की ऊपर की परत और खनिज एवं ह्यूमन बहकर मृदा की निचे की परत में चले जाते हैं।
4. लवणीकरण–
लवणीकरण में जल जमाने वाले क्षेत्रों में मृदा, जल के खनिज पदार्थों के साथ मिलकर लवणों का निर्माण करते हैं, इसे लवणीकरण कहते हैं।
5. ग्लेइंग–
ग्लेइंग में जल भराव वाले क्षेत्रों में जहाँ लंबे समय तक जल भरा रहता है, वहाँ ऑक्सीजन की उपस्थिति नही होती तथा लौहा खनिज के रासायनिकरण होने से नीले रंग की मृदा का निर्माण होता है इसे ग्लेइंग कहते हैं।
6. निच्छालन या लेटराइजेशन तथा लीचिंग–
इसमें बहुत अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में ह्यूमस व सिलिका जैसे हल्के पदार्थ जल के साथ बहकर मृदा की आंतरिक परत में चले जाते हैं, इसे 'लीचिंग' कहते हैं, जबकि भारी पदार्थ जैसे आयरन एवं एलुमिनियम आदि मृदा की ऊपरी परत में रह जाते हैं इससे लेटेराइट मृदा का निर्माण होता है। तथा इस क्रिया को लेटराइजेशन भी कहते हैं।
मृदा के घटक खनिज कण, मृदा ह्यमस,जल तथा वायु होते है, इनमें से प्रत्येक की वास्तविक मात्रा मृदा के प्रकार पर निर्भर करती है। मृदाओं में इन घटकों का संयोजन अलग-अलग होता है।
पृथ्वी की ऊपरी सतह पर मिलने वाले मोटे, मध्यम और बारीक कार्बनिक तथा अकार्बनिक मिश्रित कणों को मृदा हैं। जिसमें मृदा के निर्माण उसकी विशेषताओं एवं धरातल पर उसके वितरण का वैज्ञानिक द्वारा अध्ययन किया जाता हैं।

इन 👇 प्रकरणों के बारे में भी जानें।
1. भारत में पशुपालन- गायों की प्रमुख नस्लें
2. भारत के मसाले एवं उनकी खेती
3. राज्यवार भारतीय फसलें

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com

टिप्पणियाँ (0)

अपनी टिप्पणी दें

इस लेख पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। सबसे पहले टिप्पणी करके चर्चा शुरू करें!

लेख की अतिरिक्त जानकारी


Copyright © 2026 sarita.rfhindi.com