पृथ्वी की बाह्य संरचना व आंतरिक संरचना एवं गुरुत्वाकर्षण का महत्व | Earth's external structure and internal structure and importance of gravity.

हमारी पृथ्वी सौर मंडल की विविधताओं से भरा हुआ। एक अनूठा ग्रह है।

पृथ्वी की बाह्य संरचना व आंतरिक संरचना एवं गुरुत्वाकर्षण का महत्व | Earth's external structure and internal structure and importance of gravity.

पृथ्वी की बाह्य संरचना-

(Earth's outer structure-)

हमारे आसपास हरे-भरे मैदान, पहाड़, नदियाँ, झीलें, लहलहाते खेत, रंग-बिरंगे बाग, बगीचे, रेगिस्तान और बड़े बड़े महासागर है, ये सब पृथ्वी की बाह्य संरचना के अंतर्गत आते हैं।
हमारी पृथ्वी सौर मंडल की विविधताओं से भरा हुआ। एक अनूठा ग्रह है। आकार में यह एक नारंगी की तरह है, जो ध्रुवों पर कुछ चपटी है। कई करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी जलता हुआ आग का गोला थी, जिसकी ऊपरी सतह धीरे-धीरे ठंडा होना प्रारंभ हुई और ठंडक से पृथ्वी की ऊपरी सतह सिकुड़ने लगी जिसके परिणाम स्वरूप पृथ्वी के बाह्य तल पर अनेक परिवर्तन हुए, जिससे कहीं पठार, कहीं समतल मैदान तो कहीं घाटी, पर्वत बन गए और कालान्तर में पृथ्वी की सतह के निचलेभाग वर्षा और भूमिगत जल से झील, नदी, समुद्र और महासागरों में परिवर्तित हो गए। इस तरह पृथ्वी का स्वरूप निर्धारित हुआ था। पृथ्वी स्थिर नहीं है बल्कि लगातार गतिशील है। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक निश्चित पथ पर गति करती है, इसका पथ दीर्घ वृत्ताकार (अण्डाकार) होता है। इस पथ को पृथ्वी की कक्षा कहते हैं। अपने दीर्घ वृत्ताकार मार्ग में गति करते हुए पृथ्वी एक काल्पनिक अक्ष के सापेक्ष घूर्णन भी करती है। इस घूर्णन के कारण ही पृथ्वी के विभिन्न भाग सूर्य के सामने आते-जाते रहते हैं, इसी कारण पृथ्वी पर दिन और रात होते हैं। पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में लगभग 365 दिन 6 घंटे का समय लगता है, भारत के प्रसिद्ध खगोल शास्त्री आर्यभट्ट ने लगभग 1500 वर्ष पूर्व पाँचवीं शताब्दी में यह बता दिया था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है जिसके कारण दिन रात होते हैं।

पृथ्वी की विशेषताओं का अध्ययन प्रसिद्ध खगोल शास्त्री आर्यभट्ट, भास्कर और कोपरनिकस आदि ने किया और यह सिद्ध किया। कि पृथ्वी अपने अक्ष पर 231०/2 झुकी हुई है। इसके इसी झुके रहने के कारण सूर्य की परिक्रमा करते-करते पृथ्वी तल पर सूर्य के ताप का प्रभाव एक सा नहीं रहता है। पृथ्वी के जिस भाग पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती है अथवा कम पड़ती है, वहाँ तापमान अत्यंत कम होकर शून्य या शून्य से नीचे चला जाता है, ऐसे भाग बर्फ से ढके रहते हैं और ठंडे रहते हैं जैसे उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव प्रदेश. दुंडा, साइबेरिया का उत्तरी भाग आदि। इसी तरह पृथ्वी के जिस भाग में सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं वे भाग अत्यंत गर्म रहते हैं। जैसे भूमध्य रेखा के आसपास स्थित देश, इण्डोनेशिया, क्यूबा आदि। पृथ्वी की अपने अक्ष पर घूर्णन, सूर्य से दूरी और झुकाव के कारण ही मौसम में बदलाव और ऋतुओं में परिवर्तन होता है। हमारी पृथ्वी चारों ओर से वायु के आवरण से ढकी है इसे हम वायुमण्डल कहते हैं, इस वायुमण्डल का क्षेत्र पृथ्वी से एक निश्चित ऊँचाई तक पाया जाता है। इस वायुमण्डल मुख्यत: ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाई-ऑक्साइड, निष्क्रिय गैसें और जल वाष्प होती हैं।

वायु में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन, 21 प्रतिशत ऑक्सीजन अर्थात् वायु में ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन ये दोनों गैसे मिलकर वायु का लगभग 99 प्रतिशत भाग बनाती हैं, शेष भाग 1 प्रतिशत में कार्बन डाई ऑक्साइड, जल वाष्प, धूल के कण, निष्क्रिय गैसें, सल्फर डाई ऑक्साइड तथा अन्य गैसें होती है। पृथ्वी का अधिकांश भाग जल से ढका हुआ है। इसे हम सागर, महासागर अथवा समुद्र के रूप में जानते हैं। समुद्र के अंदर विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु तथा पौधे रहते हैं। पृथ्वी का वह भाग जहाँ जल नहीं है भू-भाग कहलाता है। इस पर पेड़-पौधे व जीव-जन्तुओं के साथ-साथ मनुष्य (हम) रहते हैं। वर्तमान में प्राप्त जानकारी के अनुसार ब्रह्माण्ड में पृथ्वी ही एकमात्र ग्रह है जहाँ पर जीवन है। प्राणिया के जीवन के लिए पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधनों के रूप में जल, वायु, सूर्य का प्रकाश, मिट्टी, खनिज पदार्थ एवं वनस्पतियाँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। इनके अभाव में प्राणियों का इस ग्रह पर जीवित रहना संभव नहीं है।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना-

(Earth's internal structure-)

पृथ्वी की बाहरी सतह के बारे में हम जानते है कि इसमें घाटिया पर्वत, मरुस्थल और समतल मैदान है, अतः बाहरी सतह कहीं पर ऊँची और कही पर नीची है। जहाँ एक और पृथ्वी की सतह का विस्तृत अध्ययन किया गया वहीं दूसरी ओर विज्ञानियों द्वारा इसके आंतरिक भाग का मॉडल तैयार किया गया है, इसको सेवफल द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है। इस मॉडल के अनुसार पृथ्वी के आंतरिक भाग को तीन प्रमुख परतों में विभाजित किया जा सकता है।
1. भूपर्पटी
2. प्रावार
3. क्रोड।

भूपर्पटी-

(Crust-)

पृथ्वी की सबसे बाहरी परत अन्य दो परतों की अपेक्षा बहुत पतली होती हैं। इसकी मोटाई लगभग 30 से 60 किलोमीटर तक है। महासागरों के नीचे यह पतली होती है। पृथ्वी के महत्वपूर्ण पदार्थ (खनिज) विभिन्न रूपों में इसी सतह पर प्राप्त होते हैं। जैसे पेट्रोलियम, कोयला, चूने का पत्थर, गैसे, धातुएँ-लोहा, ताँबा, सोना तथा बहुमूल्य रत्न इसी परत के खनन के रण प्राप्त होते हैं।

प्रावार-

(Pravar-)

प्रावार पृथ्वी की मध्य परत है, जो भू-पर्पटी से लगभग 2900 किलोमीटर की गहराई तक पाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस भाग में मुख्य रूप से पिघली हुई ठोस चट्टानों का अंश है जिसे मेग्मा कहते हैं। इसमें मुख्य रूप से लोहा तथा मैग्नीशियम सिलिकेट पाया जाता है।

क्रोड-

(core-)

यह पृथ्वी का सबसे भीतरी एवं अंतिम भाग है। पृथ्वी की सबसे ज्यादा ऊष्मा इसी भाग में रहती है। धातुओं में सबसे ज्यादा पिघला हुआ लोहा इसी भाग में रहता है।

जीवन के लिए गुरुत्वाकर्षण का महत्व

(Importance of gravity for life)

कोई भी वस्तु पृथ्वी से ऊपर दिशा में फेंके जाने के बाद वह पृथ्वी की ओर ही वापिस क्यों आ जाती है? इस तथ्य का पता सर्वप्रथम महान वैज्ञानिक सर आइजेक न्यूटन ने लगाया था। एक दिन जब वे अपने बगीचे में सेव के वृक्ष के नीचे बैठे थे, अचानक एक सेव का फल वृक्ष से टूट कर सामने आ गिरा। इस घटना ने उन्हें एक नया विचार दिया और उन्होंने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की खोज की जिसे न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक वस्तु को पृथ्वी अपनी ओर एक विशेष बल से खींचती हैं, जिसे गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं। इसके अभाव में हम न चल सकते है और न ही कोई अन्य कार्य कर सकते हैं, अतः पृथ्वी पर समस्त गतिविधियाँ गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही संभव होती हैं। पृथ्वी का द्रव्यमान ही इस गुरुत्वाकर्षण बल का निर्धारण करता है। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही वायुमंडल पृथ्वी पर बना रहता है।

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com

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