हमारे देश में कई जातियों तथा धर्मों के लोग निवास करते हैं। इनमें से कुछ वनांचलों में रहते हैं। इन लोगों की अपनी जीवन शैली, भाषा, संस्कृति तथा परंपराएँ होती है। नगरीय समाज से इनका सम्पर्क सीमित हद तक होता है। सुदूर जंगलों में इनका निवास होने से तथा विशिष्ट जीवन शैली के कारण इन्हें आदिवासी, वनवासी, जनजाति, गिरीजन या वन्य जातियों के नाम से भी जाना जाता है। आदिवासी शब्द से आशय, संबंधित स्थान के मूल निवासी से है।
जनजातियों की प्रमुख विशेषताएँ
1. एक जनजाति एक निश्चित भू-भाग में निवास करती है।
2. इनकी प्राय: अपनी भाषा (बोली) होती है।
3. एक जनजाति के सदस्यों की अपनी संस्कृति रहन-सहन व जीवन शैली होती है। एक जनजाति के सदस्य अपनी संस्कृति के नियमों का पालन करते हैं।
4. एक जनजाति के सदस्य अपनी ही जनजाति में विवाह सम्बन्ध बनाते हैं।
संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्र भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाने कल्पना की थी। अतः समाज के ऐसे वर्ग जो अपेक्षाकृत कम प्रगति कर पाये थे या पिछड़े थे उनके लिये संविधान में विशेष प्रावधान किये गये। आदिवासी या जनजातियाँ भी समाज के अन्य वर्गों की तुलना में पिछड़े रह जाने के कारण उनके लिये भी संविधान में विशेष प्रावधान किये गये हैं। प्रत्येक राज्य में कौन से आदिवासी या जनजाति वर्ग इन विशेष प्रावधानों का लाभ प्राप्त करने के पात्र होंगे यह संविधान में स्पष्ट किया गया है। प्रत्येक राज्य के लिये इन जनजातियों की अनुसूची तैयार कर संविधान में शामिल की गई है। अतः इन्हें अनुसूचित जनजातियाँ कहा जाता है।
केवल वे जनजातियाँ अनुसूचित जनजातियाँ कहलाती हैं, जो सरकार द्वारा तैयार की गई संविधान की अनुसूची में सम्मिलित हैं।
जनजातीय समाज में संगठन
समाज चाहे आदिम हो या आधुनिक, प्रत्येक समाज की एक संरचना होती है। समाज का अपना संगठन होता है, जिसके कारण समाज के सदस्य एकजुट रहते हैं। सामाजिक संगठन का तात्पर्य है- "सामाजिक संबंधों को व्यवस्थित रखना।"
जनजातियों में सामाजिक संगठन के अंतर्गत नातेदारी, विवाह, परिवार, वंश समूह, गोत्र आदि का विशेष महत्व है। जनजातियों में उनके निवास की प्रकृति एवं स्थानीय आधार पर खानाबदोशी (घुमन्तू) समूह, जनजाति आदि भागों में बाँटा जा सकता है।
जनजातियों के कुछ सामाजिक संगठन इस प्रकार है-
(1) गोत्र संगठन
जनजाति का कोई न कोई गोत्र अवश्य होता है तथा एक गोत्र के सदस्य आपस में भाई-बहन माने जाते हैं। एक गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं करते है।
(2) खानाबदोशी समूह
इन समूहों के लोग घुमक्कड़ होते हैं तथा एक निश्चित भू-भाग में निरंतर घूमते रहते हैं। इनका जीवन कठोर होता है। ऐसे प्रत्येक समाज में कई छोटे-छोटे सामाजिक समूह होते हैं, जो मनुष्यों के आपसी संबंधों के फलस्वरूप बनते हैं। ये समूह अलग-अलग होते हुए भी संगठित रहते हैं। ऐसे संगठित सामाजिक स्वरूप को 'सामाजिक संगठन' कहते हैं।
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