जनजातियों का आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जनजीवन | Economic, Social and Cultural Life of the Tribes

जनजातियों की अर्थव्यवस्था उन्नत समाज की अर्थव्यवस्था से भिन्न होती है।

जनजातियों का आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जनजीवन | Economic, Social and Cultural Life of the Tribes

आर्थिक जनजीवन

जनजातियों की अर्थव्यवस्था उन्नत समाज की अर्थव्यवस्था से भिन्न होती है। इनकी आवश्यकताएं सीमित होती है। ये अपनी सीमित आवश्यकताओं के लिए प्रकृति पर निर्भर रहते हैं। ये जनजातियां कृषि, वन उपज संग्रह तथा मजदूरी करके अपना जीवनयापन करती हैं। इनकी काफी बड़ी संख्या वन क्षेत्रों में निवास करती है। सरकारी नीतियों व प्रयासों के कारण इन जनजातियों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। उद्योग-धंधों में विस्तार के कारण जनजाति के लोग रोजगार के लिये नगरों व शहरों की ओर आकर्षित हुए है तथा उत्खनन, निर्माण कार्य, परिवहन, व्यापार और अन्य सेवाओं में भागीदारी कर रहे है। उपरोक्त क्षेत्रे में कार्य करने से अर्थव्यवस्था को गति मिली है। मध्यप्रदेश में जनजातियों में विशेषकर गोड एवं भील जनजाति के लोग निवास करते हैं। इनकी जीविकोपार्जन का एक प्रमुख साधन वनोपज संग्रह है। वनोपज संग्रहण में तेंदू, अचार, हर्रा, बहेड़ा, महुआ, सालबीज आदि वनोपज के साथ कंदमूल व शहद का संग्रहण करना गोंडी एवं भीली जनजातियों का प्रमुख आर्थिक क्रियाकलाप है। कुछ जनजाति विशेषकर गोंड एवं बैगा वनौषधि से इलाज करने का भी कार्य करते हैं। वनोपज एकत्र करने के अतिरिक्त बाँस की विभिन्न वस्तुओं का निर्माण, बढ़ईगिरी, लोहे के औजार बनाना, बोझा ढोने, कृषि व कृषि मजदूरी का कार्य भी करते हैं।

सामाजिक जनजीवन

जनजाति के लोग प्रकृति की गोद में सरल जीवन व्यतीत करते हैं। कुछ जातियाँ खानाबदोश हैं। उनकी सरल जीवनशैली में रीति-रिवाजों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। जनजातीय समाज की अपनी परम्पराएँ और मान्यताएँ होती हैं। इन्हीं के अनुसार ये अपने बच्चों के नामकरण व विवाह संस्कार करते हैं। इनके कुछ परिवारों में पिता तथा कुछ परिवारों में (दक्षिण भारत की कुछ जनजातियों में) माता मुखिया होती हैं। जनजातीय समाजों में पुत्री का जन्म भार स्वरूप नहीं माना जाता। उनमें परम्पराएं, रीति-रिवाज, सामाजिक निषेध आदि बातों का पालन किया जाता है। भील लोग बच्चे के जन्म के छठे दिन छटी मनाते हैं। गोंड़ी जनजाति में बच्चे के जन्म पश्चात रात्रि में महिलाएँ लोक गीत का गायन करती हैं तथा ये मृतक का विधिवत अग्नि संस्कार करते हैं, अग्नि-संस्कार के तीसरे दिन मुण्डन, घर द्वार की साफ-सफाई व स्नान सामूहिक तौर पर किया जाता है।

संस्कृतिक जनजीवन

जनजातियों की अपनी अलग पहचान व संस्कृति है। संगीत और नृत्य उनकी संस्कृति के अभिन्न अंग है। कृषि कार्यो, त्योहारों आदि के अवसरों पर गाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के गीत होते हैं। संस्कृति से संबंधित नियमों की अवहेलना करने पर कठोर सामाजिक दंड दिया जाता है। जनजाति के मुखिया व बड़े बुजुर्ग अपने सांस्कृतिक नियमों के पालन को सुनिश्चित करते हैं। ये दंडों का निर्धारण भी करते है। निवास और व्यवसायों में समयगत परिवर्तन के कारण वर्तमान में इनकी संस्कृति में बदलाव भी होने लगा है। भील जनजाति में होली के समय मनाया जाने वाला उत्सव 'भगोरिया हाट' का विशेष महत्व होता है। भगोरिया, घेड़िया आदि नृत्य प्रमुख होते हैं। इनके भित्तिचित्रों में पिठौरा-शैली के चित्र बहुत लोकप्रिय है। आदिम जनजातियो के लोगों में अपने शरीर पर शुभचिह्न, पशु पक्षियों और गहनों के चित्र, नाम इत्यादि का शरीर पर स्थायी अंकन करवा लेने की प्रथा लोकप्रिय है। इस अंकन को 'गुदना' कहा जाता है। जनजातियों के लोगों का विश्वास होता है कि गुदना उनके जीवन भर के आभूषण है।

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