वन–
(forest–)
पेड़-पौधे या वृक्ष हमारे पर्यावरण के महत्वपूर्ण घटक हैं। इन्हीं घने वृक्षों के मिलने से वन अर्थात जंगल बनते हैं। अतः वन ऐसे स्थान होते हैं जहाँ अनेक प्रकार के पेड़-पौधे, घास, लताएँ, झाड़ियाँ, वन्य जीव जन्तु आदि पाए जाते हैं। ये वन समस्त जीवधारियों के लिए बहुत आवश्यक है। यही कारण है कि वनों को बढ़ाना, इनके लाभों को समझना तथा इनकी रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है। पर्यावरण तथा मानवीय दृष्टि से वनों का बड़ा महत्व हैं। जो इस प्रकार हैं–
पौधों एवं जन्तुओं के आवास के रूप में–
(As a habitat for plants and animals–)
हम जानते हैं कि वनों में तरह-तरह के पेड़-पौधे पाए जाते है। वन में छोटे-छोटे नदी नाले, तालाब, पोखर इत्यादि होने से ये वन्य जीवन की परिस्थितियों को और अधिक अनुकूलित कर देते हैं। यही कारण है कि वनों में विभिन्न प्रकार के जीव जैसे शेर, चीते, हिरण, भेड़िये, हाथी, सर्प, गिलहरी, चूहे, पक्षी, कीट पतंगे, केचुए, सूक्ष्म जीव इत्यादि रहते हैं। इस प्रकार वन इन पौधों एवं जन्तुओं के आवास (निवास स्थान) है। इन सभी जन्तुओं एवं पादपों को वनों में आवास के साथ-साथ भोजन, जल, सुरक्षा आदि प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं। इसलिए वनों को इनका आवास कहा जाता है। आप सभी जानते हैं। कि प्राचीन काल में आदि मानव के रूप में हमारे पूर्वज भी वनों में ही निवास करते थे।
भूमि में जल रिसाव एवं संग्रहण–
(Land seepage and storage–)
आपने देखा होगा कि पेड़-पौधों की पुरानी पत्तियाँ, टहनियाँ इत्यादि टूटकर गिरती रहती है। इन्हें मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्म जीव अपघटित करते रहते हैं, जिससे मिट्टी पर कार्बनिक पदार्थों को एक पर्त जमा हो जाती है जिसे 'ह्यूमस' कहते हैं। इस पर्त से दो प्रमुख लाभ होते हैं-
1 ह्यूमस के कारण वर्षा का जल धीरे-धीरे रिस-रिसकर भूमि में उतरता रहता है, जिससे भूमि में नमी बनी रहती है, और पेड़-पौधों को प्रचुर मात्रा में जल उपलब्ध होता है। वनों में वर्षा का जल संग्रहित करने की प्राकृतिक व्यवस्था होती है।
2 ह्यूमस पर्त में कार्बनिक पदार्थों तथा खनिज लवणों की प्रचुर मात्रा होती है। इसलिए बीजों के अंकुरण एवं अन्य वानस्पतिक प्रजातियों को पनपने हेतु उचित वातावरण निर्मित होता है।
भू-जल स्तर में वृद्धि एवं पुनर्भरण–
(Rise and recharge of ground water level–)
हमने देखा कि वन भूमि में वर्षा का जल रिस-रिस कर भूमि में पहुंचता रहता है। जिस के कारण भूमि की भीतरी पर्तों में काफी जल एकत्रित हो जाता है। इस प्रकार जल के एकत्रित होते रहने के कारण भूमिगत जल (भू-जल) के स्तर मे वृद्धि होती है। इस जल का उपयोग पेयजलं, सिचाई एवं उद्योगों आदि में किया जाता है। जिससे भूजल स्तर में गिरावट होती रहती है लेकिन वन, जल रिस द्वारा इस स्तर में पुनः वृद्धि करते है। यह प्रक्रिया जल पुनर्भरण कहलाती है। जल पुनर्भरण भी वनों द्वारा हा किया जाता है।
भू-क्षरण एवं मृदा अपरदन रोकना–
(Preventing soil erosion and soil erosion–)
विभिन्न प्रकृतिक घटनाओं के कारण भूमि के स्वरूप में बदलाव होते रहते हैं वर्षा, आंधी के कारण भूमि की ऊपरी सतह की मिट्टी बहकर या उड़कर अन्य स्थान पर चली जाती है जिसके कारण उस स्थान पर उपजाऊ मिट्टी का अभाव हो जाता है। यह घटना भू-क्षरण एवं मृदा अपरदन कहलाती है। इसे रोकने में वनों का विशेष योगदान है। वृक्षों की जड़े गहरी होने से मिट्टी को अपने साथ बांधे रहती है, जिससे तेज बाढ़ एवं आंधी का प्रभाव भू-क्षरण नहीं होने देता, और इस तरह उपजाऊ मिट्टी नष्ट होने से बच जाती हैं।
वायु की आर्द्रता बनाए रखना–
(Maintaining air humidity–)
हम सभी जानते हैं कि तेज धूप से बचने के लिए छायादार वृक्ष के नीचे जाते हैं। वृक्षों के नीचे हम ठंडक अनुभव करते हैं इसका कारण है कि इनकी पत्तियों में अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिनसे पानी जलवाष्प के रूप में निकलता है। इस जल वाष्प के कारण वायु में नमी बढ़ जाती है जिसे आर्द्रता कहते हैं। वनों में वृक्षों की सघनता के कारण वहाँ आर्द्रता बढ़ जाती है जिससे हम ठंडक अनुभव करते हैं। इस क्रिया से उस क्षेत्र का तापमान काफी कम हो जाता है, इस प्रकार वन ताप के नियंत्रण की क्रिया में भी सहभागी हैं तथा वर्षा के लिए क्षेत्र में सघन वृक्षारोपण किया सहयोगी बनते हैं।
वनों के अन्य उपयोग–
(Other uses of forests–)
इस प्रकार हमने देखा कि वृक्ष या वन हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। पर्यावरणीय महत्वों के अलावा वनों से अनेक आर्थिक लाभ भी होते हैं। नीचे दी गई सारणी में कुछ पदार्थों एवं महत्वपूर्ण वृक्षों के नाम दिए गए हैं।
क्र. उपयोगी पदार्थ – पोधो/वृक्षों के नाम
1. जलाऊ लकड़ी – बबूल, बेर, पलाश, कटीली झाड़ियां
2. इमारती लकड़ी – सागौन, आम, नीम, शीशम, सीरस- यूकेलिपट्स
3. लाख – पलाश, खैर (लाख कीट पालन हेतु उपयोगी)
4. गोंद – बबूल, नीम
5. सुगंधित पदार्थ – चन्दन, कपूर, केवड़ा, खस
6. औषधियां – चन्दन, नीम, सहिजन, आंवला, हरड़, अर्जुन बहेड़ा, ग्वारपाठा, तुलसी
7. फल – आम, जामुन, सीताफल, अमरूद, सेब, अन्नानास
8. पशु चारा – बरगद, पीपल, वनों की घास
9. फूल – कनेर, चम्पा, गुलमोहर, गुड़हल, बोगनविलिया
10. प्रदूषण नियंत्रक वृक्ष – आम, नीम, पलाश, कनेर, शीशम, बरगद, पीपल
11. जैव ईंधन (बायो डीजल) – अरण्डी, रतनजोत
12. रंग – पलाश, इण्डिगो, गुलमोहर, मेंहदी
वन जहां प्राकृतिक जीवों का आवास है वहीं इनसे हमें अन्य दैनिक उपयोगी सामग्री प्राप्त होती हैं। वन में पाये जाने वाले जीव जन्तुओं से हम अनेक वस्तुएँ भी प्राप्त करते हैं। जैसे लाख, गोंद, सुगंधित पदार्थ, शहद, औषधियां, पशुचारा, जैव ईंधन इत्यादि।
वनों का दोहन एवं इसके दुष्परिणाम–
(exploitation of forests and its consequences–)
वृक्ष एवं वन निश्चित ही प्रकृति द्वारा मानव को दिया गया एक अमूल्य उपहार है। हम आदिकाल से ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति एवं विकास हेतु वनों का उपयोग करते आ रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि के साथ मानव ने कृषि, उद्योग एवं शहरीकरण के लिए वनों का विनाश करके भूमि प्राप्त की है। यही कारण है कि लगातार वनों का क्षेत्रफल घटता जा रहा है और इस प्रकार के असंतुलन से विभिन्न पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हो रही है जिनके कारण मानवीय स्वास्थ्य एवं प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो रहा है बढ़ती जनसंख्या से वनों का अनुचित एवं आवश्यकता से अधिक दोहन है करने से निम्नांकित दुष्परिणाम उत्पन्न हुए।
1. वन क्षेत्रफल में कमी।
2. वन्य प्राणियों की संख्या घटना।
3. पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ना।
4. वनोपज की उपलब्धता में कमी।
5. पादप एवं जन्तुओं की जातियों का लुप्त होना। भूमि एवं मिट्टी का क्षरण।
6. भू-जल स्तर घटना।
7. वातावरणीय तापमान में वृद्धि।
8. वर्षा में कमी।
वन संरक्षण–
(Forest Conservation–)
हम सभी जानते हैं कि वनों की जैविक तथा पर्यावरणीय महत्ता होती है। परन्तु शहरीकरण एवं औद्योगिकीकरण होने से वन कम होते जा रहे हैं अतः इनका संरक्षण एवं संवर्धन अत्यंत ही आवश्यक है। वर्तमान में हमारे देश में वन क्षेत्र कम होता जा रहा है। अतः वन एवं वनक्षेत्र की लगातार कमी चिंता का विषय है। वनों के संरक्षण हेतु हमें निम्नानुसार प्रयास करने होंगे।
1. वनों को काटने से बचाना।
2. वन क्षेत्र को आग से बचाना।
3. नए वृक्ष लगाना।
4. वन के वृक्षों को बीमारियों से बचाना।
5. औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण हेतु वनों की कटाई रोकना।
6. सामाजिक वानिकी द्वारा वृक्ष लगाना।
7. कानून द्वारा वृक्षों के काटने पर रोक लगाना।
8. राष्ट्रीय उद्यान, प्राणी उद्यान, वानस्पतिक उद्यान द्वारा वन संरक्षण करना।
9. आधुनिक वैज्ञानिक विधियाँ जैसे उपचारित बीज बैंक, इत्यादि द्वारा वन संवर्धन करना। बीज बैंक ऐसी प्रयोगशाला होती है जहां वृक्षों के बीज सुरक्षित रखे जाते हैं।
10. इन सब प्रयासों के अतिरिक्त समुदाय की भागीदारी भी वनों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु आवश्यक है।
वन सभी जीवों के जीवित रहने एवं आवश्यकताओं की पूर्ति के प्राकृतिक संसाधन है अतः इनके संरक्षण एवं संवर्धन में हम सभी की भूमिका होनी चाहिए नहीं तो वन्य जीवों के साथ-साथ मानव के अस्तित्व पर भी संकट आ सकता है, और हमारे अन्य प्राकृतिक संसाधन जैसे जल, वायु, जीव इत्यादि भी प्रभावित होंगे। क्योंकि किसी ने कहा है।
जल, जन, जीवन, जंगल।
बचे रह तो होगा मंगल।
हमारे अन्य प्राकृतिक संसाधन एवं इनका महत्व-
(Our other natural resources and their importance-)
हम सभी जानते हैं कि वन हमारे समस्त प्राकृतिक संसाधनों में से एक सशक्त संसाधन है। प्रकृति द्वारा हमें दिये गये अन्य संसाधन, जैसे जल, खनिज, ईंधन, सौर ऊर्जा, प्राण वायु इत्यादि हैं जिनका उपयोग भी हम विभिन्न कार्यों के लिए करते हैं। आइए इन प्राकृतिक संसाधनों को जानें।
अन्य प्राकृतिक संसाधन
(Other Natural Resources)
वनस्पतियाँ–
भोजन
वायु शुद्धिकरण
मृदा निर्माण
पदार्थों का चक्रीकरण
जल–
दैनिक उपयोग
जीवन का घटक
विद्युत उत्पादन
औद्योगिक उपयोग
सौर ऊर्जा–
जीवन रक्षक
सौर विद्युत बैटरी निर्माण
खनिज–
पौधों की बुद्धि एवं विकास
विकास कार्यों में सहायक
वायु–
श्वसन में सहायक
पौधा एवं जन्तुओं के लिए उपयोगी।
दैनिक कार्यों जैसे वाहनों, स्टोव इत्यादि में उपयोगी।
प्राकृतिक संसाधन न केवल मानव के लिए अपितु सभी सजीवों के जीवन हेतु आवश्यक है। इन संसाधनों से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जैविक तंत्र को सहारा मिलता है। इसलिए इन सभी संसाधनों का संरक्षण एवं संवर्धन हेतु हमें प्रयास करने होंगे।
आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com
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