पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति पौधों एवं जंतुओं में अनुकूलन
(Adaptation in plants and animals to environmental changes)
अभी मानव द्वारा पर्यावरण रूपान्तरण पर चर्चा की गई और इससे मानव जीवन किस प्रकार प्रभावित हुआ है, यह आपने जाना, परन्तु पेड़-पौधों और जन्तुओं के जीवन पर भी इन रूपान्तरणों का प्रभाव पड़ता है, और इन पर्यावरणीय परिवर्तनों से सामंजस्य स्थापित करने के लिए उनके शारीरिक अंगों में अनेक बदलाव हुए हैं। पर्यावरणीय परिवर्तनों से मौसम की दशायें बदलती है कहीं तेज धूप, कहीं तेज ठंड, - तो कहीं अत्यधिक वर्षा । इन पर्यावरणीय परिवर्तनों से पेड़-पौधों एवं पशु-पक्षियों की शारीरिक संरचना में प्राकृतिक रूप से धीरे-धीरे बदलाव हो जाते हैं। जैसे जिराफ की लंबी गर्दन आदि। कई पेड़-पौधे एवं जंतुओं की प्रजातियाँ ऐसी हैं जो प्राकृतिक परिवर्तनों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकीं और वे विलुप्त हो गईं। जैसे डायनासोर आदि ।
"अतः प्राकृतिक परिवर्तनों के प्रति जीवन जीने के लिए जीवों में प्राकृतिक रूप से होने वाले शारीरिक बदलाव ही अनुकूलन कहलाते हैं।"
मौसम की स्थिति के अनुसार आवास की दशाएँ बदलती हैं, जैसे तेज धूप के कारण मरुस्थलीय स्थानों पर पानी की कमी रहना, बालू मिट्टी उपलब्ध रहना। इसी प्रकार ठंडे स्थानों पर तेज ठंड रहना व वृद्धि के लिए सूर्य का प्रकाश उपलब्ध न होना तथा बर्फ जमे रहना आदि विपरीत दशायें इन स्थानों के पौधों और जन्तुओं को प्राप्त होती है, जिनमें स्वयं को जीवित रखने के लिए वे अनुकूलित होते हैं-
1. ऊष्ण जलवायु
1. Warm climate
यह तेज गर्मी वाले स्थलों में पाई जाती है, जिनमें मौसम शुष्क रहता है और गरम हवायें चलती हैं। इन स्थानों पर पानी की सदैव कमी रहती है, ऐसे स्थान मरुस्थलीय स्थल कहलाते हैं।
(1) मरुस्थलीय पौधे–
(1) Desert Plants–
इन स्थानों पर साधारण रूप से वे पेड़ नहीं होते, जिनसे इमारती लकड़ी प्राप्त की जा सके। यहाँ काँटेदार पेड़-पौधे होते हैं तथा जहाँ कहाँ भी पेड़ होते हैं, उनकी जड़ें भूमि में गहरे तक जाकर नमी प्राप्त करती हैं। छोटी जड़ों वाले पौधे ओस तथा आकस्मिक वर्षा को तुरन्त सोखकर जीवित रहते हैं। इन पौधों में निम्नलिखित अनुकूलन पाए जाते हैं।
(i) पत्ते छोटे होते हैं, जिससे प्रस्वेदन के लिए धरातल छोटा रहता है।
(ii) कई पौधों में पत्ते काँटों में बदल जाते हैं और तना हरा मांसल, पत्तीनुमा रहता है, जिसमें पानी और लवण पदार्थ संग्रहित रहते हैं। जैसे- कैक्टस में।
(iii) इन पौधों की पत्तियों के स्टोमेटा प्रायः बंद रहते हैं, जिससे वाष्पीकरण से पानी को बचाया जा सके।
(2) मरुस्थलीय जन्तु -
(2) Desert Animals -
रेगिस्तान जैसी जगहों पर पाए जाने वाले जन्तुओं में लंबे समय तक पानी, भोजन संग्रहित करने के लिए अनुकूलन पाए जाते हैं।
(i) ऊँट के पैर गद्दीदार होते हैं, जिससे रेत में धंसते नहीं हैं। इसलिए इसे रेगिस्तान का जहाज कहते हैं।
(ii) इसकी पीठ पर कूबड़नुमा उभार होता है, जिसमें चर्बी जमा होती है। भोजन न मिलने पर यही चर्बी उसे ऊर्जा प्रदान करती है।
(iii) त्वचा मोटी होती है जो सूर्य की गर्मी से बचाकर वाष्पीकरण को रोकती है।
(iv) आँखों पर घने बालों के रूप में पलकें होती हैं, जो रेत भरी हवाओं से रक्षा करती हैं।
2. शीत जलवायु-
2. Cold climate-
यह ठंडे स्थानों पर पाई जाती है, जहाँ बर्फ जमी रहती है। यहाँ पेड़-पौधे शंकु आकार के होते हैं, जिनकी पत्तियाँ लंबी पतली और नुकीली होती हैं। जिससे उन पर बर्फ नहीं जम पाती। इन पौधों में निम्नांकित अनुकूलन पाये जाते हैं।
(i) पौधों का आकार छोटा होता है।
(ii) पत्तियाँ लम्बी और नुकीली होती हैं।
(ii) सूर्य के कम प्रकाश में भी भोजन बनाने के लिए अनुकूलित होते हैं।
(1) बर्फीले प्रदेशों के जन्तु -
(1) Animals of the Snowy Regions -
(i) इनका शरीर लंबे बालों से ढँका होता है जो ठंड से बचाता है।
(ii) आँख और कान पर भी घने बाल होते हैं जो सर्द हवाओं से
सुरक्षित रखते हैं।
(ii) पूंछ छोटी होती है।
3. बरसाती क्षेत्र–
3. Rainy Area–
यह कम सूर्यप्रकाश और भारी वर्षा के क्षेत्र होते है जिनमें सदाबहार पेड़-पौधे लगते हैं।
(i) पौधों के पत्ते-चौड़े-लंबे आकार के विकसित होते हैं ताकि कम धूप में भी पौधों का विकास हो सके।
(ii) इन पौधों की पत्तियों के धरातल गहरे लाल रंग के हो जाते हैं, क्योंकि लाल रंग, हरे रंग की अपेक्षा अधिक प्रकाश ग्रहण करता है। इसके अतिरिक्त तालाब, नदी, पोखर आदि में भी जलीय पौधे तथा जीव-जन्तु अपने को पानी में रहने के लिए अनुकूलित कर लेते हैं। जैसे मछली का शरीर नौकाकार होने से उसे पानी में गति करने में मदद मिलती है और श्वसन के लिए इनमें गलफड़े होते हैं, जो पानी में घुली हुई ऑक्सीजन ही ग्रहण कर सकते हैं, इसलिए मछली पानी के बाहर निकालने पर मर जाती है। पानी में रहने के लिए मछली की आँखों पर पलकें नहीं होती, एक पारदर्शक झिल्ली होती है जो पानी के अंदर आँखों की सुरक्षा करती है। / जलीय पौधे जैसे कमल के तने में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिनमें हवा भरी होती है, जिसके कारण पौधे हल्के होकर पानी में तैरते रहते हैं। पौधे की चपटी पत्तियों तथा तने पर मोम जैसी चिकनी परत चढ़ी होती है, जिससे पानी पर तैरने के बाद भी पत्तियाँ सड़ती नहीं हैं।
इस प्रकार पेड़-पौधे और जंतुओं में वातावरण के प्रति अनुकूलन पाए जाते हैं। मानव शरीर में भी वातावरण के प्रति संवेदनाएँ होती हैं। जो उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित रखती हैं जैसे- तेज सूर्य के प्रकाश से बचने के लिए आँखों की पुतलियों का सिकुड़ना, तेज गर्मी के कारण शरीर का तापक्रम सामान्य बनाए रखने और त्वचा के नीचे एकत्रित हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने के लिए शरीर से पसीना निकलना आदि। इसके अतिरिक्त बर्फीले स्थानों के रहवासियों की आँखें और कद छोटा होता है परन्तु शरीर फुर्तीला होता है जो पहाड़ों पर ऊपर चढ़ने और उतरने के लिए अनुकूलित रहता है।
समुद्री जीवन पर बढ़ता दबाव और पर्यावरणीय समस्याएँ
Increasing pressure on marine life and environmental problems
1. खाद्यान्न एवं औषधीय पदार्थों का दोहन
1. Exploitation of food and medicinal substances
समुद्रतटीय देशों की अधिकांशतः अर्थव्यवस्था समुद्र से प्राप्त वस्तुओं के निर्यात पर ही चलती है। मछुआरे अधिकाधिक मछलियाँ समुद्र से मारकर लाते हैं, औद्योगिक स्तर पर इनकी पैकिंग कर दूसरे देशों को निर्यात किया जाता है। समुद्रों से प्राप्त शार्क, व्हेल और कुछ अन्य जीवों को मारकर उनके तेल से औषधियाँ बनाई है। समुद्र से प्राप्त सीए, पोधे शंख और कुछ वनस्पतियों से भी औषधियाँ प्राप्त की जाती है। इस प्रकार औद्योगिक स्तर पर समुद्री जीवों का दोहन करने के कारण समुद्री पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ रहा है। कई समुद्री जीवों की प्रजातियाँ समाप्त होने के निकट हैं।
2. यातायात के साधनों का विकास
2. Development of means of transport
मानव प्राचीनकाल से ही सुदूर देशों की यात्राओं के लिए समुद्र का उपयोग करता रहा है। अन्य यातायात के साधनों की अपेक्षा समुद्री यातायात सुगम एवं कम खर्चीला होने के कारण इसका उपयोग आज भी ज्यादा प्रचलित एवं विकसित है। बढ़ते यातायात ने समुद्री जीवन को प्रभावित किया। यातायात के साधनों से रिसने वाला ईंधन कई समुद्री जीवों की मृत्यु का कारण बनता है। दुर्घटनाग्रस्त तेल-वाहक पोत का ईंधन और कच्चा तेल समुद्र के तल पर फैलने से बड़ी मात्रा में समुद्री जीव और वनस्पति नष्ट हो जाते हैं।
3. समुद्री क्षेत्रों में स्थित तेल का दोहन
3. Exploitation of oil located in marine areas
समुद्र में स्थित तेल कुआँ से कच्चा तेल निकाला जाता है। जैसे अरब सागर में कई तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। ऐसे तेल क्षेत्रों में दुर्घटना में भारी मात्रा में तेल का रिसाव होता है, जो समुद्री जीवन को हानि पहुंचाता है।
4. औद्योगिक कचरे का निस्तारण
4. Industrial waste disposal
एक आम धारणा है कि समुद्र में फेंका गया अपशिष्ट उसकी विशाल जल राशि के कारण इतना तनुकृत हो जाता है कि फिर जल प्रदूषित नहीं हो पाता। इसी कारण समुद्र में कई प्रकार के औद्योगिक अपशिष्टों का निस्तारण किया जाता है। यह धारणा भी सही नहीं है। कि औद्योगिक अपशिष्टों में उपस्थित विषैले रसायन सिर्फ अनेक समुद्री जीवों और वनस्पति के नष्ट होने का कारण बनते हैं। बल्कि इन रसायनों द्वारा संक्रमित समुद्री जीव को अपने भोजन के रूप में प्रयुक्त करने से मानव स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। यह संक्रमण पूरी खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करता है।
समुद्र में फेंका जाने वाला प्लास्टिक कचरा प्रतिवर्ष 20 लाख से अधिक पक्षियों, 1 लाख समुद्री स्तनधारी जीवों व अनगिनत मछलियों को अपना शिकार बनाता है। यह लम्बे समय तक समुद्र में बना रहता है और बार-बार समुद्री •जीवों को नुकसान पहुँचाता है।
जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरणीय दुष्परिणाम
Population growth and environmental consequences
यद्यपि मानव को पृथ्वी पर सबसे समझदार जीव कहा जाता है परन्तु जैसे-जैसे उसकी संख्या बढ़ी, उसकी अपनी आवश्यकताएँ भी बड़ी और उसने पर्यावरणीय संसाधनों का दुरुपयोग करना आरंभ कर दिया।
(1) उसने बड़े-बड़े वृक्षों से युक्त वनों को काटकर कृषि योग्य भूमि तैयार की, पेड़ काटकर रहने के लिए घर बनाए तथा ईंधन के लिए लकड़ी का प्रयोग करने लगा।
5 जून का दिन, पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।
(2) विकास के अगले चरण में मानव ने भूमिगत जमीन का खनन करके धातुएँ प्राप्त की, धातुओं से यंत्र बनाए और उद्योगों की स्थापना की। उद्योगों को चलाने के लिए ईंधन की आवश्यकता हुई तब अधिक गहराई से जमीन को खोदकर कोयला और पेट्रोलियम जैसे पदार्थ निकाले गए।
(3) विकास के युग में जब जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हो गई, तब गांव से शहर बन गए और शहर से मेट्रो शहर । जिससे खेतीहर भूमि कम हो गई, खाद्यान्न की कमी हो गई। खाद्यान्न बढ़ाने के लिए ऐसे उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग होने लगा जिनसे तीव्र उत्पादन तो हुआ, परन्तु भूमि बंजर होने लगी और इन खाद्यान्न के प्रयोग करने से मानव जीवों में कई बीमारियाँ फैलने लगीं।
(4) अधिक जनसंख्या होने से सिंचाई, पीने व दैनिक कार्यों की पूर्ति के लिए पानी की आवश्यकता बढ़ गई, जिसे नलकूप, हेडपंप खुदवाकर भूमिगत जल के दोहन से पूरा किया जाने लगा। बांध और नहर बनाने के लिए नदियों का रूख मोड़ दिया गया इससे प्राकृतिक व्यवस्थायें चरमरा गई, असंतुलन की स्थिति निर्मित होने लगी। बड़े बांधों के निर्माण से धरती पर बाढ़ और भूकंप के खतरे बढ़ रहे है।
(5) जनसंख्या के साथ सुविधाओं के बढ़ने तथा वृक्षों की कमी होने से वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड (CO.) की मात्रा बढ़ गई, परिणामस्वरूप तापमान में वृद्धि हुई। इससे पहाड़ों की बर्फ पिघलने लगी।
इन सब परिणामों से आज मानव सचेत हुआ है, कई पर्यावरणीय संगठन मिलकर एक अभियान के रूप में इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। सरकारें और विश्वव्यापी नीतियों ने इसका विरोध करके कानून और नियमों के तहत मानव को रोकना शुरू किया है, इसलिए स्थिति संभलने की संभावना बन रही है। परन्तु हमें अपने स्तर से भी कुछ प्रयास करने चाहिए-
1. हमें कुछ समय जरूर निकालकर अपने बुजुगों से गमले तैयार करना, बगिया बनाना आदि सीखना चाहिए।
2. अपने मित्र को जन्मदिन के उपहार के रूप में छोटे से पौधे को देकर, उससे उसकी देखभाल करने का आग्रह करना चाहिए।
3. थोड़ा समय पशु-पक्षियों के साथ बिताकर उनकी गतिविधियों से परिचित होना चाहिए। विद्यालय में सहपाठियों के साथ पर्यावरण पखवाड़े के आयोजन में प्रकृति से जुड़ने की गतिविधियाँ करनी चाहिए।
4. खेत, उद्यान, बाग-बगीचों, की सैर के स्मरणों को लेख आदि के माध्यम से प्रकाशित करके मासिक विद्यालयीन पत्रिका बनानी चाहिए।
आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com
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