मानव शरीर के विभिन्न तंत्र एवं प्रक्रियाएँ | Various systems and processes of the human body

हड्डियों का ढाँचा कंकाल तंत्र कहलाता है। वयस्क व्यक्ति में 206 हड्डियाँ पाई जाती हैं।

मानव शरीर के विभिन्न तंत्र एवं प्रक्रियाएँ | Various systems and processes of the human body

1. कंकाल तंत्र

1. Skeletal system

हड्डियों का ढाँचा कंकाल तंत्र कहलाता है। वयस्क व्यक्ति में 206 हड्डियाँ पाई जाती हैं। शरीर की हड्डियाँ आपस में जुड़कर शरीर का निश्चित आकार बनाए रखती हैं तथा शरीर के कोमल एवं नाजुक अंगों जैसे फेफड़े, मस्तिष्क आदि की सुरक्षा करती है और शरीर को मजबूती प्रदान करती है। अपने हाथ और पैर को छूकर देखिए, आपको दबाने से कठोरता का अनुभव होगा ऐसा हड्डियों के कारण है। हड्डियाँ कड़ी होती हैं और कंकाल तंत्र बनाती हैं। आप कोहनी और घुटनों को छूकर देखिए आप अनुभव करेंगे कि यहाँ दो हड्डियाँ आपस में मिल रही हैं। यह जोड़ या संधि स्थान है। इस स्थान को आप हिला-डुला सकते हैं। शरीर में दो हड्डियों के मिलने के स्थान को संधि या जोड़ कहते हैं। संधि के कारण ही हड्डियाँ हिल-डुल पाती हैं। कान और नाक को छूकर देखिए हड्डी से कुछ नरम सा भाग आपको अनुभव होगा, यह उपास्थि (Cartilage) कहलाता है। यह कंकाल तंत्र का लचीला भाग होता है।

2. पेशीय तंत्र

2. muscular system

मनुष्य की हड्डियों को हिलाने डुलाने और शरीर को गति प्रदान करने के लिए वे पेशियों से जुड़ी होती है।
मानव में पेशियाँ तीन प्रकार की होती हैं।
1. ऐच्छिक या कंकाली पैशियाँ - हाथ पैरों में।
2. अनैच्छिक या अरेखित पेशी- आंतरिक अंगों में।
3. हृदयक पेशियाँ - हृदय में।
शरीर को गतिशील बनाने वाला तंत्र पेशीय तंत्र होता है। त्वचा के नीचे व हड्डी के ऊपर पेशियाँ पाई जाती हैं।

3. पाचन तंत्र

3. Digestive system

भोजन करते समय आप उसे अच्छी तरह चबा चबा कर खाते हैं। किसी दिन चबा कर खाना नहीं खाया तो याद कीजिये क्या होता है ? या रात को ज्यादा भोजन कर लेने से सबेरे पेट में कोई तकलीफ होती है क्या ? निश्चित ही आपका पेट दर्द हुआ होगा, खट्टी डकार आने लगी होगी। तो "तुम्हारा खाना नहीं पचा या अपच हो गया है।" इसका मतलब पाचन क्रिया ठीक नहीं हुई। पाचन क्रिया क्या है ? खाया हुआ भोजन पाचन अंगों से होकर गुजरता है तथा प्रत्येक अंग में कुछ देर ठहरता है, जहाँ इसे छोटे छोटे भागों में तोड़कर आगे बढ़ाया जाता है, पीसा जाता है। धीरे-धीरे भोजन का पाचन पूर्ण होता है और अवशोषित कर के व्यर्थ पदार्थ बाहर निकाल दिया जाता है, यही पाचन क्रिया है।

4. श्वसन तंत्र

4. Respiratory System

यदि आपको किसी ऐसे बंद कमरे में रहना पड़े जहाँ कोई खिड़की ना हो तो क्या ऐसे कमरे में आप ज्यादा देर रह पाएंगे ? नहीं रह पाएंगे क्योंकि आपका दम घुटने लगेगा, आप जल्दी से बाहर निकलने की सोचने लगेंगे। जरा सोचो दम क्यों घुटने लगेगा, क्योंकि आपको शुद्ध वायु नहीं मिली। शुद्ध वायु अर्थात् जिसमें ऑक्सीजन अधिक हो, जिसे हम हवादार जगहों पर ही पा सकते हैं। श्वसन की प्रक्रिया के समय हम श्वाँस के साथ ऑक्सीजनयुक्त हवा को अंदर लेते हैं, जब हवा फेफड़ों में पहुँचती है तो वहाँ रुधिर से ऑक्सीजन व कार्बन डाईऑक्साइड का नमय (आदान-प्रदान) होता है। अर्थात रूधिर में उपस्थित कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) निकलकर फैंफड़ों में पहुँच जाती है। जो साँस छोड़ते सम बाहर निकल जाती हैं। इसी प्रकार फेफड़ो से आक्सीजन, रक्त (रूधिर) में पहुच जाती है। ऑक्सीजन युक्त रक्त को हम शुद्ध रक्त कहते है। यह शुद्ध रक्त फेफड़ो द्वारा हृदय को तथा हृदय द्वारा सभी अंगो में पहुँचा दिया जाता है। इसी रक्त में पचा हुआ भोजन भी घुला रहता हैं। जब यह रक्त ऑक्सिजन युक्त कोशिका में पहुँचता है तो वहाँ पचा हुआ भोज्य पदार्थ इसी ऑक्सीजन की सहायता से और अधिक छोटे तथा सरल पदार्थ (CO2 तथा जल) में टूट जाता है। इस क्रिया में ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही ऊर्जा हमको कार्य करने की ताकत देती है। यह कार्बन डाई ऑक्साइड हमारे शरीर के लिए नुकसानदायक होती है। इसलिये जब हम साँस छोड़ते हैं तब कार्बन डाईऑक्साइड तथा वाष्प बाहर निकल जाते हैं।
श्वसन तंत्र के प्रमुख अंग
1. नाक या नासिका
2. श्वांस नली (ट्रेकिया)
3. फेंफड़े
श्वसन अंग - कार्य
नासिका छिद - नाक के छिद्रों से वायुमंडल की हवा को अंदर लिया जाता है।
नासिका गुहा - नाक के अंदर के स्थान को नासिका गुहा कहते हैं। इसमें पाए जाने वाले रोम कूप तथा श्लेष्मा, हानिकारक रोगाणुओं को हटाते हैं।
लैरिंग्स (कंठ) - नासिका गुहा लैरिंग्स नामक रचना में खुलती है इसके बीच में एपिग्लाटिस नामक रचना पाई जाती है जो भोजन कणों को श्वास नली में जाने से रोकती है।
श्वांस नली (ट्रेकिया) - श्वांस नली एक लंबी पाइपनुमा रचना है जो उपास्थि के छल्लों से सुरक्षित रहती है जिससे नाजुक अंगों की सुरक्षा होती है।
फेफड़े - यह शंकु के आकार की रचना है। वसीय गुहा में हृदय के दोनों ओर एक-एक फेफड़ा पाया जाता है। इसके चारों तरफ एक और गुहा पाई जाती है जिसे फुफ्फसीय गुहा कहते हैं। फेफड़े बहुत सी वायु कूपिकाओं में बटे रहते हैं। यहीं पर ऑक्सीजन का अवशोषण होता है।

5. उत्सर्जन तंत्र

5. Excretory system

शक्कर के कारखानों में गन्ने से शक्कर बनाई जाती है। गन्ने का रस निकालने के बाद बचा हुआ गन्ना यदि वहीं कारखाने में पड़ा रहे तो क्या होगा? स्थान घेरेगा एवं गंदगी फैलाएगा। कुछ दिनों बाद सड़ने लगेगा। इसलिए इसे कारखाने से बाहर फेंक दिया जाता है। बाहर निकालने के लिए मशीनों का उपयोग होता है या हाथों से बाहर किया जाता है। यह कारखाने का व्यर्थ पदार्थ (अपशिष्ट या उत्सर्जी) होता है। ऐसे ही जीवधारियों में भोजन का पाचन होता है जिससे मल-मूत्र जैसे अपशिष्ट पदार्थ बनते हैं। इन व्यर्थ और हानिकारक पदार्थों का शरीर से बाहर निकाला जाना ही उत्सर्जन कहलाता है। उत्सर्जन क्रिया में भाग लेने वाले अंग उत्सर्जी अंग कहलाते हैं। बाहर किए जाने वाले पदार्थ, उत्सर्जी पदार्थ कहलाते हैं।
मानव में उत्सर्जन
मानव के उत्सर्जी पदार्थ
1. कार्बन डाइ ऑक्साइड (गैस)
2. अपशिष्ट भोज्य पदार्थ (मल)
3. पसीना (स्वेद)
4. यूरिया (मूत्र)।
मल-मूत्र और पसीना मनुष्य के उत्सर्जी पदार्थ हैं। शरीर में बना हुआ अमोनिया तथा कार्बनडाइऑक्साइड मिलकर यूरिया बनाते हैं। इस हानिकारक यूरिया को मूत्र के रूप में त्यागा जाता है।
उत्सर्जी अंग
1. वृक्क
मनुष्य का प्रमुख उत्सर्जी अंग वृक्क है। ये वृक्क जोड़े में होते हैं। वृक्क के अतिरिक्त और भी क्रिया में भाग लेते हैं। इसलिए इन्हें मूत्राशय तंत्र कहते हैं।
ये अंग निम्नलिखित है।
1. एक जोड़ी वृक्क
2. एक जोड़ी मूत्रवाहिनी (यूरेटर)
3. मूत्राशय
इसके अलावा त्वचा और यकृत से भी उत्सर्जन का कार्य होता है।
2. त्वचा
मनुष्य की त्वचा में पसीने की ग्रंथियाँ पाई जाती हैं इनमें से पसीना बाहर निकलता रहता है। इस पसीने के साथ थोड़ी मात्रा में अपशिष्ट पदार्थ तथा घुले हुए लवण बाहर निकलते हैं।
पसीना = जल + लवण + यूरिया
3. यकृत
यूरिया का निर्माण यकृत में ही होता है। जहाँ से छनने के लिए यह वृक्क में जाता है। वृक्त रक्त में से यूरिया निकाल कर मूत्रवाहिनी व मूत्राशय की सहायता से इसको मूत्र के रूप में शरीर से निकाल देता है।

6. परिसंचरण तंत्र

6. Circulatory system

हमने श्वसन में जो ऑक्सीजन गैस अन्दर ली है और जो भोजन ग्रहण किया है उसे शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाना परिसंचरण तंत्र का कार्य है। इस कार्य के लिए हमारे शरीर में 'नलिकाएँ पाई जाती हैं जिन्हें हम वाहिनियाँ कहते हैं। इन नलिकाओं की सहायता से रक्त द्वारा पचा हुआ भोज्य पदार्थ, ऑक्सीजन एवं अन्य आवश्यक पदार्थ शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाए जाते हैं तथा अनुपयोगी पदार्थों को उत्सर्जी अंगों तक पहुँचाकर बाहर निष्कासित कर दिया जाता है।
मानव शरीर में यह कार्य जिस तंत्र द्वारा किया जाता है उसे रक्त परिसंचरण तंत्र कहते हैं।
यह निम्नांकित अंगों से मिलकर बना होता है।
1. हृदय
2. रक्त वाहिनियाँ
3. रक्त
1. हृदय
हृदय रक्त परिसंचरण तंत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। यह पम्प के समान कार्य करता है। जिसके कारण रक्त वाहिनियों में बहता रहता है। यह तिकोनाकार पेशीय रचना है और जो सीने में बांयी तरफ स्थित होता है। इसमें चार कक्ष होते हैं। दो कक्ष ऊ पर जिन्हें आलिंद व दो कक्ष नीचे जिन्हें निलय कहते हैं। आलिंद व निलय विभिन्न वाहिनियों से जुड़े रहते हैं। जिनसे रक्त शरीर में बहता रहता है। हृदय के दाँये भाग अर्थात् दाँये आलिन्द व दाँये निलय में ऑक्सीजन विहीन रुधिर तथा बाँये आलिंद व बाँये निलय में ऑक्सीजन युक्त रुधिर होता है। आलिंद निलय कपाट की सहायता से दाँया आलिंद दायें निलय में व बाँया आलिंद बाँये निलय में खुलता है। हृदय क्रमशः फैलता-सिकुड़ता रहता है, इसके लगातार फैलने सिकुड़ने के कारण रुक-रुक कर धक-धक की आवाज सुनाई देती है। हृदय की इस आवाज को हृदय-स्पंदन कहते हैं। स्वस्थ मनुष्य के शरीर में एक मिनिट में लगभग 72 बार हृदय स्पंदन करता है, जिसे धड़कन कहते हैं।
2. रक्त वाहिकाएँ
हृदय से शरीर के विभिन्न भागों को रक्त ले जाने तथा हृदय में वापस लाने के लिए वाहिनियाँ पाई जाती हैं जिन्हें रक्त वाहिकाएँ कहते हैं। यह वाहिकाएँ निम्नांकित प्रकार की होती हैं।
1. धमनियाँ
2. शिराएँ
3. केशिकाँए
धमनियाँ
ये गहरे लाल रंग की दिखायी देती है। जो ऑक्सीजन युक्त रक्त को हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों में ले जाती हैं, ये शरीर की गहराई में स्थित होती हैं। इनकी दीवारें मोटी लचीली होती हैं, क्योंकि इनमें रक्त अधिक दबाव से बहता है।
शिराएं
ये हरे-नीले रंग की दिखाई देती हैं। ये शरीर में कम गहराई (ऊपरी सतह) में स्थित होती हैं, इन्हें हम त्वचा के नीचे आसानी से देख सकते हैं। ये कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों से हृदय में लाती हैं। इनको दीवारें पतली अपेक्षाकृत कम लचीली होती हैं। इनमें रक्त कम दबाव के साथ बहता है। इनकी भीतरी दीवार पर कपाट पाए जाते हैं जो औरत को विपरीत दिशा में बहने से रोकते हैं।
केशिकाएँ
शरीर के विभिन्न अंगों तक रक्त पहुँचाने तथा वापस लाने के लिए क्रमश: धमनियाँ तथा शिराएँ ऊतकों में जाकर अत्यंत महीन शाखाओं में बंट जाती है, जिन्हें केशिकाएँ कहते हैं। इनकी दीवारें बहुत पतली होती है।
3. रक्त
यह लाल रंग का तरल पदार्थ है जो ऑक्सीजन, विभिन्न कार्बनिक, अकार्बनिक पदार्थों, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य उत्सर्जी पदार्थों को शरीर के विभिन्न अंगो के मध्य परिवहन करता है। रक्त में तीन प्रकार की रुधिर कणिकाएँ पाई जाती हैं।
लाल रक्त कणिकाएँ
यह गोलाकार या अण्डाकार होती हैं। इनमें लोहयुक्त पदार्थ हीमोग्लोबिन पाया जाता है। जो ऑक्सीजन से संयोग कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन नामक अस्थायी यौगिक बनाती हैं शरीर के प्रत्येक भाग में यह पुनः टूट जाता है, ऑक्सीजन प्रदान करता है।
फेफड़े के रक्त में हीमोग्लोबिन + ऑक्सीजन ऑक्सीहीमोग्लोबिन
कोशिका में ऑक्सीहीमोग्लोबिन ऑक्सीजन + हीमोग्लोबिन

श्वेत रक्त कणिकाएँ
इनका आकार निश्चित नहीं होता। हमारे शरीर में सैनिक के समान कार्य करती हैं, जब भी कोई रोगाणु, उपाणु या बाह्य पदार्थ हमारे शरीर प्रवेश करते हैं तब ये कणिकाएँ उन्हें प्राप्त कर देती हैं।
रक्त पट्टिकाएँ
जब कभी हमारे शरीर में चोट लगती है और बहने लगता है। उस समय ये कणिकाएँ चोट वाले स्थान पर जाकर रक्त का थक्का जमा देती हैं, जिससे शरीर अधिक रक्त नहीं वह पाता।
रक्त के कार्य
1. रक्त ऑक्सीजन, भोजन, हार्मोन एवं अन्य आवश्यक पदार्थों को शरीर के विभिन्न भागों में ले जाता है।
2. रक्त कार्बन ऑक्साइड तथा अन्य उत्सर्जी पदार्थों को शरीर के विभिन्न भागों से लाकर फेफड़ों एवं यकृत की सहायता से निष्कासित कर देता है।
3. यह शरीर की रोगों एवं संक्रमण से रक्षा करता है।
शरीर में रक्त किस प्रकार बहता है-
शरीर के विभिन्न भागों से कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य उत्सर्जी पदार्थ युक्त रक्त, शिराओं द्वारा हृदय के दाएँ भाग में लाया जाता है। जहाँ यह फुफ्फुस धमनी द्वारा फेफड़ों में भेजा जाता है, यहाँ पर रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन का आदान-प्रदान होता है। फेफड़ों में से ऑक्सीजन युक्त रुधिर फुफ्फुस शिरा द्वारा हृदय के बाँए भाग में ले जाया जाता है जहाँ से यह शरीर के विभिन्न भागों में पम्प कर दिया जाता है।

7. जनन तंत्र

7. reproductive system

सभी सजीव अपने समान जीव पैदा कर सकते हैं, इसे प्रजनन कहते हैं। इस कार्य को करने के लिए जो अंग होते हैं उन्हें जननांग कहते हैं। समस्त जननांग मिलकर जननतंत्र का निर्माण करते हैं।
मनुष्य एकलिंगी प्राणी है जिसमें नर एवं मादा तंत्र अलग-अलग शरीर में पाए जाते हैं।

8. तंत्रिका तंत्र

8. nervous system

जब कभी आप कमरे से निकल कर तेज प्रकाश में आते हैं आपको देखने में समस्या आती है, पलके झपकने लगती हैं। कुछ देर बाद आप सामान्य हो जाते हैं। इस तरह बाहर के वातावरण के परिवर्तन से आपके शरीर के अंग संतुलन बनाते हैं। वातावरण में लगातार होने वाले परिवर्तनों का पता हमें ज्ञानेन्द्रियों से होकर मस्तिष्क तथा मेरुरज्जू से होता है। मस्तिष्क अथवा मेरुरज्जू तक इस ज्ञान को पहुंचाने वाले संवेदी अंग को तंत्रिका कहते हैं। संदेश पहुँचने पर मस्तिष्क इनकी प्रतिक्रिया का निर्णय कर तंत्रिका तन्तुओं के माध्यम से शरीर के अंगों को कार्यान्वयन की आज्ञा देता है। तंत्रिकाओं का जाल समस्त शरीर में फैला है। इसे तंत्रिका तंत्र कहते हैं।
इस तरह तंत्रिका तंत्र के प्रमुख 3 अंग हैं।
1. मस्तिष्क
2. मेरुरज्जू
3. तंत्रिकाएँ
मस्तिष्क, कपाल के अंदर स्थित होता है। मेरूरज्जू, मेरुदंड के बीच रहती है। तंत्रिकाएँ सम्पूर्ण शारीरिक भागों में उपस्थित होती है।
कार्य -
1. स्मरण रखना
2. निर्णय लेना
3. सभी अंगों पर नियंत्रण एवं समन्वय बनाना।
4. संवेदनशीलता।

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