वेद भारत के प्राचीन ग्रंथ हैं। वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, अरण्यक आदि को वैदिक साहित्य कहते हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान अथवा पवित्र आध्यात्मिक ज्ञान। विद्वान लोग वैदिक काल और वैदिक साहित्य को दो भागों में बाँटते हैं- प्रारंभिक दौर का प्रतिनिधित्व ऋग्वेद करता है। इस काल को पूर्व वैदिककाल या ऋग्वैदिक काल भी कहा जाता है और बाद के दौर में शेष तीनों वेद (सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद), ब्राह्मण, अरण्यक और उपनिषद् आते हैं। इस काल को उत्तर वैदिक काल भी कहा जाता है। वैदिक साहित्य को समृद्ध होने में लंबा समय लगा। वैदिक साहित्य से हम वैदिक काल के लोगों के निवास के क्षेत्र, उनके खान-पान व रहन-सहन के विषय में जान पाते हैं। इस युग की संस्कृति को ही वैदिक संस्कृति कहते हैं।
इतिहासकारों का मत है कि इस काल में कुछ लोग उत्तर-पूर्वी ईरान, कैस्पियन सागर या मध्य एशिया से छोटे छोटे समूहों में आकर पश्चिमोत्तर भारत में बस गये। ये अपने आप को आर्य कहते थे। कतिपय इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते हैं क्योंकि इसके पुरातात्विक व साहित्यिक प्रमाण नहीं हैं। उनका मत है कि आर्य भारत के मूल निवासी थे। सभ्यता और संस्कृतियों का विकास सदैव नदियों के किनारे हुआ है। सिन्धु, सतलज, व्यास, सरस्वती नदियों के किनारे आर्यों ने ऋचाओं की रचना की, जिनका संग्रह ऋग्वेद है।
वर्तमान में विलुप्त, सरस्वती नदी का वर्णन वैदिक साहित्य में मिलता है। पुरातत्ववेत्ताओं तथा भूवैज्ञानिकों ने अपनी नवीन खोजों से सिद्ध किया है कि सरस्वती नदी 2000 ई.पू. तक पृथ्वी पर प्रवाहित होती रही होगी। पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि हड़प्पा सभ्यता का उद्गम तथा विनाश सरस्वती नदी के किनारे हुआ होगा।
सामाजिक जीवन
आर्य पहले छोटे-छोटे कबीलों में बसे था। कबीले छोटी-छोटी इकाइयों में बँटे थे जिन्हें 'ग्राम' कहते थे। प्रत्येक ग्राम में कई परिवार बसते थे। इस समय संयुक्त परिवार हुआ करते थे एवं परिवार का सबसे वृद्ध व्यक्ति मुखिया हुआ करता था।
समाज मुख्यतः चार वर्णों में बंटा था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। यह वर्गीकरण लोगों के कर्म (कार्यो) पर आधारित था न कि जन्म पर। गुरुओं और शिक्षकों को ब्राह्मण, शासक और प्रशासकों को क्षत्रिय, किसानों, व्यापारियों और साहूकारों को वैश्य तथा दस्तकारों और मजदूरों को शूद्र कहा जाता था। लेकिन बाद में व्यवसाय पैतृक होते चले गए और एक व्यवसाय से जुड़े लोगों को एक जाति के रूप में माना जाने लगा। हुनर में विशेषज्ञता बढ़ने के साथ-साथ जातियाँ भी बढ़ने लगी और जाति तथा वर्ण-व्यवस्था कठोर बनती गई। एक वर्ण से दूसरे में जाना कठिन हो गया।
समाज की आधारभूत इकाई परिवार थी। बाल विवाह नहीं होते थे। युवक एवं युवतियाँ अपनी पसंद से विवाह कर सकते थे। सभी सामाजिक और धार्मिक अवसरों पर पत्नी पति की सहभागिनी होती थी। महिलाओं का सम्मान था और कुछ को तो ऋषि का दर्जा भी प्राप्त था। पिता की संपत्ति में उसकी सभी संतानों का हिस्सा होता था। भूमि पर व्यक्तियों तथा समाज का स्वामित्व था। मुख्यत: चारे वाली भूमि, जंगल तथा जलाशयों जैसे तालाब और नदियों पर समाज का स्वामित्व होता था जिसका अभिप्राय था कि गाँव के सभी लोग उनका उपयोग कर सकें।
खान-पान
वैदिक काल में आजकल के सभी अनाजों की खेती की जाती थी। इसी प्रकार आर्यों को सभी पशुओं की जानकारी भी थी। लोग चावल, गेहूँ के आटे तथा दालों से बने पकवान खाते थे। दूध, मक्खन और घी का प्रयोग आम था। फल, सब्जियाँ, दालें और मांस भी भोजन में सम्मिलित थे। वे मधु तथा नशीला पेय सुरा भी पीते थे। धार्मिक उत्सवों पर सोम पान किया जाता था। सोम और सुरा पीने को हतोत्साहित किया जाता था क्योंकि यह व्यक्ति के अशोभनीय व्यवहार का कारण बनते थे।
आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com
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