अपशिष्ट प्रबंधन | waste management

हमारे आसपास पाई जाने वाली बेकार एवं अनुपयोगी वस्तुओं (अपशिष्टों) को अपनी आवश्यकता के अनुरूप पुन: उपयोगी बनाने अथवा उनकी मात्रा में कमी करने की प्रक्रिया निस्तारण कहलाती है।

अपशिष्ट प्रबंधन | waste management

अपशिष्ट और उनका निस्तारण

तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या, बदलती जीवन शैली तथा पाश्चात्य सभ्यता "उपयोग करो और फेंक दो" की प्रवृत्ति के कारण भी अपशिष्ट पदार्थ दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। अंतः आवश्यक है कि अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा को कम कर उनका सही प्रबंधन एवं निस्तारण (निपटारा) किया जाए।

निस्तारण

हमारे आसपास पाई जाने वाली बेकार एवं अनुपयोगी वस्तुओं (अपशिष्टों) को अपनी आवश्यकता के अनुरूप पुन: उपयोगी बनाने अथवा उनकी मात्रा में कमी करने की प्रक्रिया निस्तारण कहलाती है।

ठोस अपशिष्ट पदार्थों का निस्तारण

ठोस अपशिष्टों की मात्रा में कमी लाना जलाकर -

ज्वलनशील अपशिष्ट पदार्थों जैसे सूखी पत्तियाँ, कागज, सूखी घास, पॉलीथीन आदि को एकत्रित करके खुले स्थान पर जला दिया जाता है, किन्तु यह उपयुक्त विधि नहीं है। पदार्थों के जलने पर निकलने वाला धुआँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है तथा वातावरण को प्रदूषित करता है।
अस्पतालों से निकलने वाले अपशिष्ट संक्रामक होते हैं। अतः उन्हें विशेष प्रकार की बंद भट्टियों में जलाया जाता है, जिससे वातावरण प्रदूषित नहीं होता एवं संक्रमण का खतरा भी कम जाता है।

भूमि में गाड़ना

मृत जानवरों, माँस आदि के टुकड़ों तथा फलों एवं सब्जियों आदि के छिलकों को जमीन में गड्ढा खोदकर गाड़ देने से ठोस अपशिष्टों की मात्रा को कम किया जा सकता है।

भूमि-भरण- (भू-भरण)

यह प्राचीन एवं सबसे अधिक उपयोग में आने वाली विधि है। इसमें बस्ती से दूर बंजर एवं अनुपयोगी जमीन पर ठोस अपशिष्ट को डाल कर पतली तहों में फैला दिया जाता है तथा मिट्टी से बँककर बुलडोजर से दबा दिया जाता है। गाँवों में गड्ढों आदि को भरने के लिए भी यह विधि उपयोग में लायी जाती है।
यह विधि सस्ती एवं उपयोगी है, किन्तु सही ढंग से क्रियान्वित नहीं किये जाने के कारण अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जैसे-
(1) कुछ लोग उपयोगी सामान ढूँढने के लिए इस दबाए हुए कचरे को फैला देते हैं, जिससे दुर्गन्ध फैल है एवं पर्यावरण प्रदूषित होता है।
(ii) वर्षा ऋतु में मच्छर, मक्खियाँ आदि पैदा होने के कारण स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियाँ पैदा होती हैं। अतः आवश्यक है कि इस विधि को उपयोग में लाते समय पर्यावरणीय समस्याओं का भी ध्यान रखा जाए।

जैविक खाद बनाना

घर के आँगन में तथा विद्यालय प्रांगण में गड्ढा खोदा जाता है जिसमें जैविक अपशिष्ट पदार्थों को डालकर उन्हें पत्तियों तथा मिट्टी से ढांककर रखा जाता है, जिससे 40 50 दिनों बाद जैविक खाद बनकर तैयार हो जाती है।

बायो गैस गोबर गैस बनाना-

मवेशियों के मल-मूत्र, फसलों के अवशेष से बायोगैस/गोबर गैस बनाई जाती है।

पुन: उपयोग में लाना-

ठोस अपशिष्ट के विभिन्न अवयवों को पुन: उपयोग में लाकर निस्तारित किया जा सकता है, जैसे-

अपशिष्ट का नाम

1. चावल, कपास तथा गेहूँ के छिलके, पौधों की पत्तियाँ
2. गन्ने की खोई
3. लकड़ी का बुरादा
4. पौधों की पत्तियाँ, फलों एवं सब्जियों के छिलके
5. जीव जन्तुओं के बाल
6. जन्तुओं के सींग
7. अनाज के छिलके
8. प्लास्टिक, पॉलीथीन

उपयोग

1. कच्चे मकान बनाने में मिट्टी के साथ मिला कर उपयोग करने में।
2. कच्चे मकानों की छत बनाने में।
3. घरों में ईंधन के रूप में।
4. जैविक खाद बनाने में।
5. बुश बनाने में।
6. कंघी एवं खिलौने बनाने में।
7. भूसा, पशुओं को खिलाने में।
8. कार्पेट, रस्सी एवं सड़क निर्माण में।

पुनर्चक्रण करना

कागज, काँच, प्लास्टिक, धातु के टुकड़े आदि ऐसे पदार्थ हैं, जिनका पुनर्चक्रण किया जा सकता है।
बेकार एवं अनुपयोगी पदार्थों का रूप बदलकर उन्हें पुन: उपयोग हेतु तैयार करना, पुनर्चक्रण कहलाता हैं।
1. बेकार कागज एवं अखबार की रद्दी को गलाकर कम गुणवत्ता का कागज अथवा पुट्ठा बनाया जाता है।
2. काँच एवं धातुओं के टुकड़ों को गलाकर पुन: काँच एवं धातुओं की उपयोगी सामग्री बनाई जाती है।
3. प्लास्टिक पदार्थों को गलाकर पुन: प्लास्टिक का नया सामान बनाया जाता है।
4. प्लास्टिक एवं पॉलीथीन को डामर अथवा कोलतार के साथ गला कर सड़क बनाने हेतु उपयोग में लाया जाता है, इसमें निर्मित सड़के उत्तम गुणवत्ता की होती हैं यह पॉलीथीन के निस्तारण का एक उत्तम उपाय है।

द्रव अपशिष्ट पदार्थों का निस्तारण

मात्रा में कमी लाना-

घरों एवं औद्योगिक संस्थानों में जल की आवश्यक मात्रा का ही उपयोग करना चाहिए, जिससे अपशिष्ट जल की मात्रा कम की जा सके।

पुन: उपयोग में लाना-

1. रसोई घर से निकलने वाले जल का उपयोग बगीचे/किचन गार्डन में किया जा सकता है।
2. गांव/शहर की नालियों से निकलने वाले जल का उपयोग बगीचे में किया जा सकता हैं।

पुनर्चक्रण करना-

1. अपशिष्ट जल के निकास के स्थान पर सोक पिट अथवा सील्ड पिट बनाकर जल को पुन: उपयोगी बनाया जा सकता है।
2. अपशिष्ट जल को उपचारित करने के उपरान्त ही जल स्रोतों में मिलाना चाहिये, अन्यथा जल संक्रमित हो जाता है तथा पीने एवं नहाने योग्य नहीं रहता।

गैसीय अपशिष्ट पदार्थों का निस्तारण

1. उन्नत चूल्हों का उपयोग कर धुएं की मात्रा कम की जा सकती है।
2. रसोई गैस एवं बायोगैस का उपयोग घरेलू ईंधन के रूप में करने से गैसीय अपशिष्ट कम मात्रा में उत्पन्न होते हैं।
3. वाहनों में विषैले धुएँ को रोकने के लिए सीसा रहित पेट्रोल का उपयोग करना चाहिए एवं अवछन्नक का उपयोग भी करना चाहिए।
4. कारखानों से निकलने वाली अपशिष्ट गैसों के निस्तारण के लिए ऊँची चिमनियों का उपयोग करना चाहिए।
5. फ्रिज, ए.सी. की गैसों के निस्तारण हेतु इन्हें वायु निकास (खिड़की) के पास रखना चाहिए। ठोस, द्रव एवं गैसीय अपशिष्ट पदार्थों के निस्तारण हेतु अनेक उपाय किये जाते हैं, किन्तु उचित प्रबंधन न होने के कारण सभी उपाय सार्थक नहीं हो पा रहे हैं। विभिन्न स्थानों पर अपशिष्ट पदार्थों के ढेर दिखाई देते हैं तथा वातावरण दूषित होता है। अतः आवश्यक है कि अपशिष्ट पदार्थों का उचित प्रबंधन किया जाए।

अपशिष्ट पदार्थों का प्रबंधन

अपशिष्ट पदार्थों का नियमित संग्रहण एवं समुचित स्थानों पर निपटारा ही अपशिष्ट पदार्थों का प्रबंधन है।
ठोस, द्रव एवं गैसीय अपशिष्ट पदार्थों में ठोस अपशिष्ट अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न हो रहे हैं, जिस कारण उनका प्रबंधन अत्यन्त आवश्यक है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन

एकत्रीकरण
पृथक्करण
पुनर्चक्रण
निस्तारण

व्यक्तिगत एवं सामुदायिक सहयोग

प्रत्येक मोहल्ले में सफाई कर्मचारियों द्वारा झाडू लगाकर कचरापेटी में कचरा डाल दिया जाता है, जिसे विभिन्न प्रकार के वाहनों द्वारा शहर अथवा गाँव से बाहर अन्तिम निपटारे के लिए ले जाया जाता है, किन्तु कई बस्तियों एवं संस्थानों से निकलने वाला कचरा ठीक प्रकार से कचरा पेटी में एकत्रित न होकर परिसर में फैला रहता है, क्योंकि कचरे की मात्रा कचरा पेटी की क्षमता से अधिक होती है।
1. जन जागृति के अभाव में लोग कचरा पेटी का उपयोग न करते हुए घर के पिछवाड़े अथवा खाली पड़ी जगह पर कचरा फैला देते हैं। अतः जन जागृति होना आवश्यक है।
2. रेल्वे प्लेटफार्म, सड़कों आदि पर झूठन, पॉलीथीन, मूँगफली, फलों आदि के छिलके फेंककर वातावरण को दूषित किया जाता है, जिसके लिए जन जागरूकता लाना आवश्यक है। इसी तरह सार्वजनिक सम्पत्ति जैसे रेल, बस आदि में यात्रा करते समय भोज्य पदार्थों का कचरा फैलाना सामाजिक दायित्वों की अवहेलना करना है। सार्वजनिक सम्पत्ति के दुरूपयोग के लिए दण्ड का प्रावधान है।
कचरे में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ होती है। अत: कचरे की मात्रा को कम करने हेतु आवश्यक है, कि उसका पृथक्करण किया जाए।

पृथक्करण

जैव अपघटनीय कचरा
अजैव अपघटनीय कचरा
1. कचरे के उत्पादन स्थलों (स्रोतों) पर ही यदि काँच, प्लास्टिक, धातु, सब्जी एवं फलों के छिलकों आदि को जैव अपघटनीय एवं अजैव अपघटनीय पदार्थों के रूप में अलग-अलग एकत्रित किया जाए, ताकि कचरे की मात्रा कम की जा सके।
2. जैव अपघटनीय कचरे से कम्पोस्ट खाद बनाई जा कर उसका उपयोग खेतों एवं बगीचों में किया जा सकता है। जबकि अजैव अपघटनीय कचरे को पुनर्चक्रण के लिए कबाड़ी (पुराना सामान खरीदने वाला) को दिया जा सकता है।
3. अपने घर में दो कूड़ेदान बनाएँ एक में सब्जी, फलों के छिलके, सूखे पत्ते आदि जैव अपघटनीय कचरें को एकत्रित करें, दूसरे में काँच, प्लास्टिक, धातु के टुकड़े आदि अजैव अपघटनीय कचरा एकत्रित करें एवं "उनका अलग-अलग निस्तारण करें।
प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि अपशिष्ट प्रबंध हेतु सहयोग प्रदान करें। अपने दैनिक क्रियाकलाप में अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा में कमी लाने का प्रयास करें। पुन: उपयोग एवं पुनर्चक्रण किये जा सकने वाले अपशिष्टों का पृथक्करण कर लेना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने घर, आसपास के क्षेत्र के अपशिष्टों के प्रबंधन हेतु परिवार, समाज और आम नागरिक के सहयोग से अपने मोहल्ले, गाँव, शहर को स्वच्छ, सुन्दर बनाकर स्वस्थ पर्यावरण का निर्माण किया जा सकता है।

शासकीय एवं स्थानीय संस्थाओं की कार्य प्रणाली

1. सार्वजनिक स्थलों पर एकत्रित कचरे को रहवासी से दूर ले जाकर निपटाने का उत्तरदायित्व सामान्यतः ग्राम पंचायत/नगर पालिका/नगर निगम का होता है।
2. ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का कार्य स्वास्थ्य अधिकारी की देखरेख में होता है। कचरे को शहर से बाहर ले जाने के लिए अभियांत्रिकी विभाग का सहयोग लिया जाता है। दिल्ली, मुम्बई आदि बड़े शहरों में अपशिष्ट प्रबंधन हेतु एक अलग प्रभाग होता है। कुछ शहरों में यह कार्य निजी संस्थाओं को सौंप दिया जाता है।
3. औद्योगिक इकाईयों से निकलने वाले अपशिष्ट का निपटारा उनके द्वारा ही किया जाना आवश्यक है, जिसकी देखरेख पर्यावरण नियंत्रण मण्डल की जिम्मेदारी होती है।

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com

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