मापन का इतिहास
भारत वर्ष में मापन का स्पष्ट लिखित वर्णन आयुर्वेद में मिलता है। रोगी को औषधि की उचित मात्रा दी जाती थी। अर्थात उस काल के लोग मात्रा पद से सुपरिचित थे। प्राचीन भारतीय खगोल शास्त्र में काल एवं गति पदों का उपयोग प्रचलित था। इस प्रकार प्राचीन काल से ही भारत में मापन का सैद्धांतिक रूप से प्रचलन था। छोटे-बड़े मात्रक भी निर्धारित थे। मध्यकाल में भारत में लंबाई का मापन, अंगुल, हाथ और बास से किया जाता था। इसका प्रमाण कवि चन्द्रवरदायी द्वारा पृथ्वीराज चौहान को संबोधित करके कहे गए इस ऐतिहासिक दोहे से मिलता है।
मध्यकाल सन् 1556 ई. से लेकर मिट्रिक पद्धति आने से पूर्त तक हमारे देश में लम्बाई की माप के लिए गज, फुट,इच का प्रयोग होता था। द्रव्यमान की माप के लिए मन, सेर, छटाक आदि का प्रयोग होता था। प्रत्येक मापन में दो भाग होते हैं। प्रथम भाग 'संख्यात्मक मान' एवं द्वितीय भाग 'मात्रक'। उदाहरण के लिए हम कुछ मापों पर विचार करें जैसे एक किलोग्राम, पांच मीटर, दो लीटर, चार घंटे इत्यादि। किसी पदार्थ की एक किलोग्राम तौल में किलोग्राम एक बार सम्मिलित है। यहाँ एक संख्यात्मक मान है और किलोग्राम मात्रक।
निष्कर्ष- किसी भौतिक राशि में कोई मात्रक जितनी बार सम्मिलित होता है वही उस भौतिक राशि की माप (Measurement) कहलाता है।
मानक मात्रकों की आवश्यकता एवं उपयोग-
पूर्व में लम्बाई को उंगलियों के पोर, पंजे, हाथ एवं कदमों द्वारा नापा जाता था जो चित्र द्वारा प्रदर्शित है।
उपर्युक्त क्रियाकलाप के आधार पर हम यह सकते हैं कि विभिन्न मनुष्यों के हाथ, कदम या बालिश्त की लम्बाइयाँ एक समान नहीं होती, अतः यह लम्बाई मापने के उचित मात्रक नहीं है। इसलिए इन्हें लम्बाई मापन की अमानक इकाइयाँ कहते हैं।
मापन की इकाई (मात्रक) ऐसी हो जिससे किसी भी व्यक्ति द्वारा नापने पर माप समान आए। अर्थात माप ऐसी हो जिसका प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक ही अर्थ हो।
अंतर्राष्ट्रीय मापन पद्धति (S.I.)-
मापन में एकरूपता लाने के लिए हमें मानक मात्रकों की आवश्यकता पड़ती है। जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समानता रहे। इस हेतु वैज्ञानिकों द्वारा पर्याप्त प्रयास किए गए और एक सर्व मान्य मात्रक पद्धति विकसित की गई। इसे अंतर्राष्ट्रीय मात्रक पद्धति कहा जाता है। इसे संक्षेप में S.I. मात्रक कहते हैं।
इसमें निम्नलिखित सारणी में अंकित मात्रको को स्वीकार किया गया है।
सारणी
भौतिक राशि – SI मात्रक – संकेत
लम्बाई – मीटर – m
द्रव्यमान – किलोग्राम – kg
समय – सेकण्ड – s
ताप – केल्विन – k
पदार्थ की मात्रा – मोल – mol
ज्योति तीव्रता – कैण्डेला – Cd
विघुत धारा – एम्पियर – A
लम्बाई, द्रव्यमान और समय के प्रचलित मात्रको की परिवर्तन तालिका
लम्बाई
10 मिलीमीटर (mm) = 1 सेन्टीमीटर (cm)
10 सेन्टीमीटर = 1 डेसीमीटर (dm)
10 डेसीमीटर = 100 सेंटीमीटर = | मीटर (m)
10 मीटर = 1 डेकामीटर (da)
10 डेकामीटर = 1 हेक्टोमीटर (= 100 मीटर) (h)
1000 मीटर =1 किलोमीटर (km )
द्रव्यमान
1000 मिलीग्राम (mg ) = 1 ग्राम (g)
1000 ग्राम (g) = 1 किलोग्राम (kg)
100 किलोग्राम (kg) = 1 क्विटल
समय
60 सेकण्ड (s) = 1 मिनट (min.)
60 मिनट (min.) = घंटा (h)
24 घंटे (h) = 1 दिन
365 दिन (लगभग) = 1 वर्ष।
लम्बाई मापन की विधियाँ एवं दैनिक जीवन में उपयोग-
हम अपने दैनिक जीवन में लम्बाई नापने के लिए भिन्न-भिन्न साधनों का उपयोग करते हैं। जैसे कपड़ा खरीदते समय मीटर (छड़) का उपयोग करते हैं। सिलाई का कार्य करने वाला व्यक्ति आपका नाप लेने के लिए फीते का उपयोग करता है। पेंसिल की लम्बाई नापने के लिए आप प्लास्टिक धातु या लकड़ी की स्केल का उपयोग करते हैं। अतः स्पष्ट है कि अलग-अलग वस्तुओं की लम्बाई नापते समय आवश्यकतानुसार अलग-अलग प्रकार के साधनों (युक्तिओं) को उपयोग में लाते हैं। जिस वस्तु की लम्बाई नापनी होती है उस वस्तु की आकृति और आकार के आधार पर हम उचित पैमाने का चयन करते हैं। जैसे पेंसिल की लम्बाई नापते समय ऐसी स्केल का चयन करते हैं जिसमें सेन्टीमीटर और मिलीमीटर के चिन्ह अंकित हों। किस वृक्ष के तने का घेरा नापने के लिए चिन्हांकित फीते (टेप) का उपयोग करते हैं क्योंकि यह आसानी से मुड़ जाता है। आइए हम नीचे अंकित सारिणी में लिखी कुछ वस्तुओं की लम्बाई/गोलाई नापकर देखें।
यथार्थ मापन-
किसी वस्तु की लम्बाई, चौड़ाई, गहराई, ऊँचाई इत्यादि सभी दूरियों के मापन में कम्पास स्केल, मीटर स्केल, टेप (फीता) आदि सामान्यतः प्रयुक्त किए जाते हैं।
1. किसी रेखाखण्ड की लम्बाई नापने के लिए हम कम्पास स्केल का उपयोग करते हैं।
2. इसी प्रकार पेंसिल, रबर सिक्के की मोटाई आदि छोटी लम्बाइयों को कम्पास स्केल से नापते हैं।
3. तुलनात्मक रूप से अधिक बड़ी लम्बाइयों जैसे खेल के मैदान की लम्बाई, खेत की लम्बाई आदि मापने के लिए फीता का उपयोग करते हैं।
4. तार, रस्सी, सरिया इत्यादि की लम्बाई नापने के लिए मीटर स्केल का उपयोग किया जाता है।
5. क्षेत्रफल की SI इकाई वर्गमीटर है।
6. इसकी बड़ी इकाई हैक्टेयर है। 1 हैक्टेयर = 10,000 वर्गमीटर।
7. खेत के क्षेत्रफल की माप हैक्टेयर में करते हैं।
8. लम्बाई नापते समय कुछ सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए।
सावधानियाँ
1. पैमाने (स्केल) को वस्तु के समान्तर सटाकर रखना चाहिए।
2. पैमाने (स्केल) पर आँख की सही स्थिति (B) में रखना चाहिए। (A) तथा (C) गलत स्थितियां हैं।
3. घिसे या टूटे सिरे वाले स्केल से सही मापन के लिए वस्तु को चित्रानुसार स्थिति में रखकर सही माप ज्ञात करना चाहिए।
समय का मापन एवं घड़ियों का उपयोग-
ठीक समय पर प्रातः काल उठना, ठीक समय पर रात्रि में सोना । समय पर नित्यकार्य से निवृत्त होना, समय पर विद्यालय पहुंचना आदि सब में समय की पाबंदी आवश्यक है। दैनिक जीवन में हमारे सभी कार्य समय पर पूर्ण हो अर्थात ठीक उसी समय हो जब उन्हें सम्पन्न करना तय किया गया हो, इसके लिए आवश्यक है कि हम समय की माप करके प्रत्येक कार्य करें। अतः समय की माप करना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। इस कार्य के लिए घड़ी की सहायता लेनी पड़ती है।
आइए हम प्राचीन काल में प्रचलित कुछ घड़ियों के बारे में जाने।
1. सूर्य घड़ी–
सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच किसी वस्तु की परछाई (छाया) की लम्बाई समय के साथ घटती-बढ़ती है। इस तथ्य को आधार मानकर ये घड़ियाँ बनाई जाती थीं।
जयपुर के महाराजा जयसिंह ने ऐसी ही घड़ियों का निर्माण भारत वर्ष में पाँच स्थानों पर करवाया था उनमें से मध्यप्रदेश में स्थित उज्जैन भी एक स्थान है। आज भी यह घड़ी उज्जैन स्थित वेधशाला में मौजूद है। धूप घड़ियों द्वारा समय की पर्याप्त शुद्धतापूर्वक गणना की जा सकती थी। परन्तु सूर्यास्त के उपरांत इनका उपयोग नहीं किया जा सकता था।
2. रेत घड़ी–
समय की गणना करने के लिए प्राचीन काल में रेत घाड़ियां भी उपयोग में लाई जाती थीं। इस घड़ी में दो प्रकोष्ठ होते है। A प्रकोष्ठ की सम्पूर्ण रेत को B प्रकोष्ठ में पहुंचने में एक निश्चित समयान्तराल लगता है। इस आधार पर इस घड़ी की रचना की गई।
3. दोलन घड़ी (पेन्डुलम वॉच)-
चित्र में दृढ़ आधार S से एक धागा बंधा है। धागे के दूसरे सिरे पर एक गोलाकार पिण्ड बंधा है। इस पिण्ड को O बिन्दु से A बिन्दु तक ऐसे ले आए की धागा ढीला न होने पावे। अब पिण्ड को छोड़ दें। पिण्ड जैसी गति करता है उसे दोलनी गति कहते हैं। O से A तक, A से O तक, O से B तक और B से O तक की गति को एक दोलन कहते हैं और एक दोलन में लगने वाला समय दोलन काल कहलाता है। यदि धागे की लम्बाई और प्रयोग करने का स्थान नहीं बदले तो दोलनकाल कभी नहीं बदलता। अर्थात एक दोलन में सदैव समान समय लगता है। इस आधार पर इस घड़ी की रचना हुई।
खेल कूद प्रतियोगिता में समयान्तर के माप के लिए विराम घड़ी (स्टाप वॉच) का उपयोग करते हैं।
ताप मापन एवं तापमापी की अवधारणा-
विभिन्न वस्तुओं को हाथ से छूने पर हमें उन वस्तुओं के ठंडे या गर्म होने का अनुभव होता है, धातु से बने बर्तन, फर्निचर आदि छांव में रखे होने पर ठंडे तथा धूप में रखे होने पर गर्म महसूस होते हैं। वस्तुओं की ठंडक या गर्मी को नापने के लिए प्रायः तापमापी का उपयोग किया जाता है।
तापमापी द्वारा कोई वस्तु किस स्तर तक गर्म या ठंडी है, नापी जा सकती है। किसी वस्तु का ताप उस वस्तु के गर्म अथवा ठंडे होने के स्तर का माप है। ताप का SI मात्रक केल्विन K है, लेकिन व्यवहार में ताप को सेल्सियस (°C) में मापा जाता है। ताप नापने के लिए फैरनहाइट भी एक प्रचलित स्केल है। इसमें ताप को °F से व्यक्त किया जाता है।
तापमापी (Thermometer) कई प्रकार के होते हैं, सबसे प्रचलित, तापमापी, घरों में पाया जाने वाला डॉक्टरी थर्मामीटर है। इस थर्मामीटर द्वारा शरीर के ताप (ज्वर) की माप की जाती है। स्वस्थ मनुष्य के शरीर का ताप 37°C होता है। इस तापमापी से ताप मापते समय चमकीला पतला सिरा बल्ब B शरीर के सम्पर्क में नियत समय लगभग दो मिनट तक रखना चाहिए। उपयोग में लाने के पूर्व तापमापी को हाथ से झटके देकर पारे (चमकीले द्रव) को स्केल के 35°C से नीचे लाया जाना चाहिए।
मापन में मापतौल विभाग की भूमिका-
आपने विभिन्न भौतिक राशियों के SI मात्रकों के बारे में जाना। भारत सरकार का मापतौल विभाग बाजार में माप व तौल के बाँट तथा तुला आदि का प्रचलन निर्धारित मानकों के अनुसार ही सुनिश्चित करता है। ऐसा करने से मापन में एकरूपता रहती है। वस्तुओं का क्रय या विक्रय करते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि दुकानदार द्वारा जिस मीटर, बाँट अथवा तुला आदि का उपयोग किया जा रहा है वह मापतौल विभाग के निर्धारित मानकों के अनुसार अवश्य हो। मापतौल विभाग मापन के लिए उपयोग में लाई जाने वाली विभिन्न युक्तियों पर मुहर लगाकर प्रमाणित करता है।
लम्बाई नापने की सही मीटर छड़ पर मुहर के साथ-साथ उसके दोनों सिरों पर तीर के (←→) चिन्ह बने होते हैं। यदि मीटर पैमाने पर दोनों ओर तीर के चिन्ह अंकित नहीं हों तो वह मीटर प्रामाणिक नहीं है। संभव है कि उसका तीर वाला कुछ भाग काट दिया गया हो। ऐसे मीटर से खरीदी गई वस्तु की माप (लंबाई कम हो सकती है। द्रव्यमान मापन के लिए उपयोग में लाई जाने वाली तुलाओं के तुलादंड के दोनों ओर मापतौल विभाग की मुहर लगी होना चाहिए। इसका हत्था इस प्रकार बनाया जाता है जिससे तुलादंड को अनुचित ढंग से झुकाया नहीं जा सकता। तुला का दंड केंद्रीय अक्ष पर घूमने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। वस्तुओं का क्रय या विक्रय करने से पहले हमें यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि दुकानदार द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले बॉट सही है अथवा नहीं। सही बाँट की एक सतह पर उसका भार लिखा होता है। उसकी निचली सतह पर एक गड्डा सा होता है, नापतौल विभाग इस गड्ढे में पिघलाकर सीसा भर देता है और सीसे पर अपनी मुहर भी लगा देता है। यह प्रमाणित बाँट होता है। प्रमाणित बाँट से ही क्रय-विक्रय करना चाहिए।
ईंट-पत्थर के बॉट व अन्य अप्रमाणित बाँट अथवा तुला का उपयोग करना कानूनी अपराध है। अच्छे. नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम मानक तुला एवं बाँटों को ही उपयोग में लाएँ एवं अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करे।
आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com
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