सम्राट अशोक एवं उसका हृदय परिवर्तन
सम्राट अशोक मौर्य वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक हुआ था। उसे अपने दादा चन्द्रगुप्त और पिता बिन्दुसार से एक विशाल और सुव्यवस्थित साम्राज्य विरासत में मिला था। अशोक ने कलिंग राज्य को जीतकर अपने साम्राज्य में मिलाने का निश्चय किया। अपने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष में उसने कलिंग पर विजय प्राप्त की। युद्ध में दोनों ही सेनाओं को भारी नुकसान हुआ। एक लाख सैनिक मारे गये तथा लाखों लोग घायल हुए। भीषण नरसंहार और जनता के कष्ट के दृश्य को देख अशोक का मन विचलित हो गया। युद्ध में अकारण मारे गये लोगों तथा घायल सैनिकों की पीड़ित स्त्रियों और बच्चों को देखकर भी उसे बड़ी पीड़ा हुई। उसने भविष्य में कभी युद्ध न करने का प्रण किया। सम्राट अशोक ने अपने तीस साल के शासन में कलिंग युद्ध के बाद कोई युद्ध नहीं लड़ा। उसने लोगों को शांतिपूर्वक रहने की शिक्ष उसका विशाल साम्राज्य सुदूर दक्षिण को छोड़कर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में था। अशोक ने इतने साम्राज्य पर शांतिपूर्वक और धर्म पर चलते हुये शासन किया। उसने लोगों को अनेक संदेश दिये, जो भी चट्टानों, स्तंभों, शिलाओं पर खुदे (देखे जा सकते हैं। ये शिलालेख पत्थरों तथा स्तंभों पर खुदवाकर ऐसे स्थानों पर लगवाए गए जहां लोग एकत्रित होकर उन्हें पढ़े और शिक्षा ग्रहण करें। अशोक के शिलालेख ब्राह्मी, खरोष्ठी व अरेमाइक लिपि में मिलते हैं। इनकी भाषा प्राकृत है। ब्राह्मी लिपि भारत में, खरोष्ठी लिपि पाकिस्तान क्षेत्र में तथा अरेमाइक लिपि अफगानिस्तार क्षेत्र में प्रचलित थी। अतः शिलालेखों में आम जनता की भाषा व लिपि का प्रयोग किया गया ताकि वे अपने सम्राट के विचारों को समझे।
अशोक का धर्म
कलिंग युद्ध के परिणामस्वरूप सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हो गया। उसने बुद्ध त्याग करके 'धम्म विजय' का मार्ग अपनाया। बाद में अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था। वह ऊँचे मानवीय आदर्शों में विश्वास करता था, जिससे लोग सदाचारी बने और शांति से रहे। इन्हें उसने 'धम्म' कह संस्कृत के धर्म शब्द का प्राकृत रूप 'धम्म' है। धर्म को राजाओं के माध्यम से सभी प्रांतों में शिलालेखों के रुप में खुदवाया। अशोक चाहता था कि सभी धर्मों के लोग शांतिपूर्वक रहें। छोटे, बड़ों की आज्ञा माने। बच्चे, माता- पिता का कहना सुने। मालिक अपने नौकरों से अच्छा व्यवहार करे। वह मनुष्य और पशु दोनों की हत्या का विरोधी था। उसने धार्मिक अनुष्ठानों में पशु बलि पर रोक लगा दी। अशोक चाहता था कि लोग मांस न खाये इसलिये उसके खुद के रसोई घर में प्रतिदिन पकाएं जाने वाले हिरण और मोर के मांस पर रोक लगा दी।
अशोक का प्रशासन
अशोक अपनी प्रजा की अपने बच्चों की तरह देखभाल करता था। उसने प्रजा की भलाई के अनेक कार्य किए जैसे
1. पुरो व नगरों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए अच्छी सड़के बनवाई ताकि लोग सरलता से यात्रा कर सके।
2. राहगीरों को तेज धूप से बचाव के लिये सड़कों के दोनों ओर छाया व फलदार वृक्ष लगवाएं।
3. पानी के लिये कुएं, बावड़ी, बाँध बनवाये।
4. यात्रियों के रुकने के लिए अनेक धर्मशालाएं बनवाई।
5. रोगियों के लिए चिकित्सालय खुलवाए एवं निःशुल्क औषधियों को देने की व्यवस्था करवाई।
6. पशुओं एवं पक्षियों के लिये अलग से चिकित्सा केंद्रों का प्रबंध किया इन्हें पिंजरापोल कहा जाता था।
राजधानी पाटलिपुत्र में प्रशासन के प्रत्येक विभाग के अध्यक्ष रहते थे। सम्राट को सलाह देने के लिए। "मंत्रि-परिषद्' थी। साम्राज्य को चार प्रांतों में बांटा गया था। प्रत्येक प्रान्त का शासन एक राज्यपाल सँभालता था, जो अधिकतर राजकुमार होता था।
प्रत्येक प्रान्त को जिलों में बांटा गया था तथा जिलों में गाँवों को सम्मिलित किया गया था। राजाज्ञा के पालन व कानून व्यवस्था के लिए कई अधिकारी थे। कुछ अधिकारी कर वसूली का काम करते थे और कुछ न्यायाधीश होते थे। गांवों में अधिकारियों के दल होते थे। जो पशुओं का लेखा-जोखा रखते थे। नगरों की व्यवस्था को नगर परिषदें देखती थी। इन अधिकारियों के अलावा उसने 'धर्म महामात्य' भी नियुक्त किये थे, जो घूम-घूम कर लोगों की समस्याएं सुनते, स्थानीय कामों की जांच-पड़ताल करते और लोगों को धर्मानुसार आचरण करने और मेल जोल से रहने की प्रेरणा देते थे।
पड़ोसी देशों से संबंध
सम्राट अशोक ने दूर-दूर तक के राज्यों में अपने धर्मदूत भेजे तथा उनसे मित्रता की। उसने श्रीलंका में धर्म प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संधमित्रा को भेजा। श्रीलंका के राजा ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। इसी तरह दूसरे कई देशों के लिए उसने अपने दूत भेजे थे।
आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com
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