वैदिक संस्कृति का आर्थिक जीवन एवं धर्म और दर्शन, वैदिक काल के समय विज्ञान |

वैदिक काल के लोगों का आर्थिक जीवन कृषि, कला, हस्तशिल्प और व्यापार पर केंद्रित था।

वैदिक संस्कृति का आर्थिक जीवन एवं धर्म और दर्शन, वैदिक काल के समय विज्ञान |

वैदिक संस्कृति का आर्थिक जीवन

वैदिक काल के लोगों का आर्थिक जीवन कृषि, कला, हस्तशिल्प और व्यापार पर केंद्रित था। बैलो और सांडों का खेती करने एवं गाड़ियाँ खींचने के लिए उपयोग किया जाता था। रथ खीचने के लिए बोड़ो का उपयोग किया जाता था। पशुओं में गाय को सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं पवित्र स्थान दिया जाता था। वैदिक काल में गाय को चोट पहुँचाना अथवा उसकी हत्या करना वर्जित था। गाय को अघ्न्य (जिसे न तो मारा जा सकता है और न ही चोट पहुँचाई जा सकती है) कहा जाता था। वेदों में गौहत्या अथवा गाय को चोट पहुँचाने पर परिस्थिति अनुसार देश निकाला अथवा मृत्यु दंड देने का प्रावधान है।
प्रारंभिक काल में बर्तन बनाना, कपड़ा बुनना, धातु कर्म, बढ़ई का काम इत्यादि व्यवसाय थे। प्रारंभिक काल में धातुओं में केवल ताँबा धातु की ही जानकारी थी। दूर-दूर तक व्यापार होता था। वेदों में समुद्री मार्ग से व्यापार की चर्चा आती है। बाद के काल में हमें अन्य कई व्यवसायों, जैसे गहने बनाना, रंगरेजी, रथ बनाना, तीर-कमान बनाना तथा धातु पिघलाने आदि की जानकारी मिलती है। हस्तशिल्पियों की श्रेणियाँ (संघ), भी धनी और उनके मुखिया को श्रेष्ठी कहा जाता था। बाद के काल में लोहे की जानकारी होने के बाद ताँबा लोहित अयस और लोहा श्याम अयस के नामों से जाना जाने लगा।
प्रारंभिक काल में लोग स्वेच्छा से राजा को उसकी सेवाओं के फलस्वरूप उपहार के रूप में बलि (ऐच्छिक उपहार) दिया करते थे जो बाद में एक नियमित कर बन गया जिसे शुल्क कहा जाता था। उस समय उपयोग किए जाने वाले सिक्कों को निष्क कहा जाता था।

धर्म और दर्शन

ऋग्वेद काल के लोग प्रकृति की शक्ति दर्शाने वाले बहुत से देवताओं की पूजा करते थे जैसे- अग्नि, सूर्य, वायु, आकाश और वृक्ष। इनकी पूजा आज भी होती है। हड़प्पा सभ्यता में हम कई वस्तुओं जैसे पीपल, सप्तमातृकाओं और शिवलिंगों का चित्रण पाते हैं जिन पर हिंदू आज भी श्रद्धा रखते हैं। अग्नि, वात और सूर्य से समाज की रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती थी। इंद्र, अग्नि और वरुण सबसे अधिक मान्य देवता थे। यज्ञ एक जाना-माना धार्मिक कृत्य था। कभी-कभी बड़े विशाल यज्ञों का आयोजन किया जाता था जिसमें बहुत से पुरोहितों की आवश्यकता होती थी।
उत्तर वैदिक काल में कर्मकांड और यज्ञ के साथ साथ ज्ञान मार्ग को महत्व दिया गया। ज्ञान मार्गी चिंतकों (दार्शनिकों) द्वारा जिन प्रश्नों पर चर्चा की गई है वे हैं- ईश्वर क्या है? ईश्वर कौन है? जीवन क्या है? संसार क्या है? मृत्यु के पश्चात मनुष्य कहाँ जाता है? आत्मा क्या है? इत्यादि। दार्शनिकों के चिंतन को उनके निकट बैठने वाले शिष्यों ने कंठस्थ किया और बाद में उन्हें लिपिबद्ध किया गया। ये ग्रंथ 'उपनिषद' कहलाये। उपनिषद भारतीय दर्शनशास्त्र के प्रमुख ग्रंथ है। इन्हें वेदों के अंग माना जाता है।

वैदिक काल के समय विज्ञान

वेद, ब्राह्मण और उपनिषद् इस समय के विज्ञान के विषय में पर्याप्त जानकारी देते हैं। गणित की सभी शाखाओं को सामान्यतः गणित नाम से ही जाना जाता था जिसमें अंकगणित, रेखागणित, बीजगणित, खगोल विद्या और ज्योतिष सम्मिलित थे।
वैदिक काल के लोग त्रिभुज के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाना जानते थे। वे वृत्त के क्षेत्रफलों के वृत्त वर्गों के योग और अंतर के बराबर का वर्ग भी बनाना जानते थे। शून्य का ज्ञान था और इसी कारण बड़ी संख्याएँ दर्ज की जा सकीं। इसके साथ ही प्रत्येक अंक के स्थानीय मान और मूल मान की जानकारी भी थी। उन्हें घन, घनमूल, वर्ग और वर्गमूल की जानकारी थी और उनका उपयोग किया जाता था।
वैदिक काल में खगोल विद्या अत्यधिक विकसित थी। वे आकाशीय पिंडों की गति के विषय में जानते थे और विभिन्न समय पर उनकी स्थिति की गणना भी करते थे। इससे उन्हें सही पंचांग बनाने तथा सूर्य एवं चंद्रग्रहण का समय बताने में सहायता मिलती थी। वे यह जानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है। चाँद, पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमता है। उन्होंने पिंडों के घूर्णन का समय ज्ञात करने तथा आकाशीय पिंडों के बीच की दूरियाँ मापने के प्रयास भी किए।
वैदिक सभ्यता काफी उन्नत प्रतीत होती है। लोग नगरों, प्राचीर से घिरे नगरों (पुरों) तथा गाँवों में रहते थे। वे दूर-दराज तक व्यापार करते थे। विज्ञान पढ़ा जाता था और विज्ञान की विभिन्न शाखाएँ अत्यधिक विकसित थीं। उन्होंने सही पंचांग बनाए और चंद्र एवं सूर्य ग्रहणों के समय की पूर्व सूचना दी। आज भी हम उनकी विधि से गणना कर ग्रहण का समय ज्ञात कर सकते हैं।

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com

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