हड़प्पा सभ्यता का पतन एवं हड़प्पा सभ्यता में कृषि व पशुपालन, सिल्क तथा तकनीकी ज्ञान, धार्मिक मान्यता, लिपि, माप तोल, मोहरे |

इस सभ्यता के इतने बड़े नगर जमीन में दबकर कैसे नष्ट हो गये, इस संबंध में अब तक इतिहासकार पूरी तरह से संतुष्ट नहीं है।

हड़प्पा सभ्यता का पतन एवं हड़प्पा सभ्यता में  कृषि व पशुपालन, सिल्क तथा तकनीकी ज्ञान, धार्मिक मान्यता, लिपि, माप तोल, मोहरे |

हड़प्पा सभ्यता का पतन

इस सभ्यता के इतने बड़े नगर जमीन में दबकर कैसे नष्ट हो गये, इस संबंध में अब तक इतिहासकार पूरी तरह से संतुष्ट नहीं है। अब तक प्राप्त प्रमाणों के अनुसार ऐसा अनुमान है कि इतनी विशाल सभ्यता के पतन में निम्नलिखित कारक उत्तरदायी रहे होंगे-
1. भूकम्प आने के कारण संभवतः सिंधु नदी का मार्ग बदल गया होगा और ये नगर भूस्खलन में जमीन में दब गया होगा।
2. इस क्षेत्र में वर्षा की कमी व बढ़ते हुए रेगिस्तान से इस क्षेत्र में खेती तथा पशुपालन पर बुरा असर पड़ा होगा और इस सभ्यता का पतन हो गया।
3. कुछ लोगों का अनुमान है कि सिंधु नदी में बाढ़ आई होगी और सभ्यता का अन्त हो गया होगा।

हड़प्पा सभ्यता में कृषि व पशुपालन

हड़प्पा सभ्यता की जीवन दायिनी नदी सिंन्धु थी। यह नदी अपने साथ भारी मात्रा में उपजाऊ मिट्टी लाती थी। हड़प्पा सभ्यता के लोग गेहूँ. जौ, सरसों, कपास, मटर तथा तिल की फसलें उगाते थे। संभवतः किसानों से राजस्व के रूप में अनाज लिया जाता था। हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न नगरों में मिले कोठार (अनाज गोदाम) इसके प्रमाण हैं।
कालीबंगा में पाये गये जुताई के मैदान से प्रतीत होता है कि उनका खेती का तरीका आज की तरह ही था।
हड़प्पा निवासी कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी करते थे। ये बैल-गाय, बकरी, भेड़, सूअर, भी कुत्ता, ऊँट तथा हाथी, घोड़ा पालते थे। ये सिंह, गेंडा, हंस, बतख, बन्दर, खरगोश, मोर, हिरण, मुर्गी तोता, उल्लू आदि जानवरों से परिचित थे। इनमें से कुछ जानवरों की स्वतंत्र आकृतियाँ व कुछ का अंकन मिट्टी को मुहरों पर मिला है।
1. हड़प्पा निवासी विश्व के प्रथम लोग थे जिन्होंने कपास का उत्पादन सबसे पहले सिन्यु क्षेत्र में किया। मोहनजोदड़ो में बुने हुए सूती कपड़े का एक टुकड़ा मिला है, और कई वस्तुओं पर कपड़े के छापे भी मिले हैं। कताई के लिए तकलियों का इस्तेमाल होता था।
2. गुजरात के हड़प्पा सभ्यता के लोग चावल उपजाते थे और हाथी पालते थे। ये दोनों बातें मेसोपोटामिया के निवासियों को ज्ञात न थी।

शिल्प तथा तकनीकी ज्ञान

हड़प्पा सभ्यता ताम्राश्म काल की है। यह कांस्य युग भी कहलाता है। ताँबे में जिक/ टिन मिलाकर कांसा बनाया जाता था। कांसा ताँबे की तुलना में अधिक मजबूत होता है। खुदाई से प्राप्त सामग्री के आधार पर ज्ञात होता है कि इस सभ्यता के लोगों ने धातुओं के गलाने, ढालने और सम्मिश्रण की कला में विशेष उन्नति की थी। मिट्टी के बर्तन बनाने, खिलौने बनाने, मुहरे निर्माण करने में यहां के कलाकार सिद्धहस्त थे। प्रतिमाओं को पकाया भी जाता था। इसके अलावा स्वर्णकार चांदी, सोना और रत्नों के आभूषण और विभिन्न रंगों के मनके भी बनाते थे। कांसे की नर्तकी उनकी मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना है।

धार्मिक मान्यताएँ

हड़प्पा सभ्यता में किसी भी देवालय के प्रमाण नहीं मिले हैं। पकी हुई मिट्टी की स्त्री प्रतिमाएँ भारी संख्या में मिली हैं। इससे अनुमान होता है कि देवी उपासना प्रचलित थी। एक मुहर पर तीन सींग युक्त ध्यान करते हुए देवता का अंकन है। यह पद्मासन में बैठा है। इसके आसपास एक हाथी, एक बाघ, एक गेंडा, एक भैसा व दो हिरण का अंकन है। कुछ पुरातत्वविदों ने इस देवता की पहचान पशुपति (शिव) के रूप में की है।
हड़प्पा में पकी मिट्टी व पत्थर पर बनें लिंग और योनि के अनेक प्रतीक मिले हैं। इसके अलावा कमण्डल, यज्ञवेदी, स्वास्तिक आदि के अवशेष हड़प्पा सभ्यता के लोगों के धार्मिक विचारों व क्रिया-कलापों की जानकारी प्रदान करते हैं।
मध्यप्रदेश के कायथा (जिला उज्जैन) की खुदाई से हड़प्पा सभ्यता के समान एक मुहर, सेलखेड़ी के मनके, मिट्टी की मूर्तियाँ तथा मिट्टी के बर्तन मिले हैं।
कूबड़ वाले सांड की मृणमूर्ति तथा अंकन कई मुहरों पर मिलता है। उत्खनन में ताबीज बड़ी तादाद में मिले है। शायद हड़प्पावासी भूत-प्रेतों में विश्वास कर उनसे रक्षा के लिये ताबीज पहनते थे।
हड़प्पा सभ्यता में पीपल के वृक्ष की पूजा के प्रमाण मृणमुहरों तथा पात्रों पर मिलते हैं। इस वृक्ष की उपासना आज तक जारी है। भारतीय पीपल को पवित्र वृक्ष मानते हैं। वैज्ञानिक भी इस वृक्ष को पर्यावरण शुद्धि की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हैं। पात्रों पर किये कई चित्रण धार्मिक विचारों की जानकारी प्रदान करते हैं। कुछ पात्रों पर मोर का अंकन मिलता है। आज भी भारत के विभिन्न अंचलों में कुम्हार लोग अपने द्वारा निर्मित पात्रों में मोर का अंकन करते हैं।
हड़प्पा सभ्यता के लोगों के विभिन्न धार्मिक विश्वास भले ही रहे हों परन्तु वे योग विद्या के प्रारंभिक जनक भी थे। मृणमुहरों पर प्राप्त चित्रांकन से इस बात की पुष्टि होती है कि हड़प्पावासी योगिक क्रियाओं के जानकार थे।

लिपि

हड़प्पावासियों को लेखन कला का भी ज्ञान था। संभवतः उनकी लिपि चित्र लिपि थी। इन्हें चित्र या अक्षर के रूप में लिखा जाता था। लेकिन इस लिपि को आज तक सुनिश्चित रूप से पढ़ा नहीं जा सका है।

माप-तौल

हड़प्पावासी माप-तौल के तरीकों से परिचित थे। माप हेतु ये 'बाट' और 'दंड' का प्रयोग करते थे। खुदाई से बाट व कांसे का माप का उपकरण (पैमाना) प्राप्त हुआ है।

मुहरें

हड़प्पावासियों की सर्वोत्तम कलाकृतियाँ उनकी मृणमुद्राएं हैं। अब तक खुदाई से लगभग 5000 मुद्राएं प्राप्त हो चुकी हैं। इन पर जानवरों की आकृतियाँ तथा लघु लेख अंकित है।

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com

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संलग्न दस्तावेज़

फाइल का नाम: Harappan Civilization (1).jpg

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