नन्द वंश (लगभग ईसा पूर्व 363-342) एवं राजनैतिक व प्रशासनिक जीवन शैली | Nanda dynasty (about 363-342) and political and administrative lifestyle.

नन्द वंश का संस्थापक नन्द/नन्दिवर्धन था। पुराणों में इसे उग्रसेन भी कहा गया है।

नन्द वंश (लगभग ईसा पूर्व 363-342) एवं राजनैतिक व प्रशासनिक जीवन शैली | Nanda dynasty (about 363-342) and political and administrative lifestyle.

नन्द वंश (लगभग ईसा पूर्व 363-342)

Nanda dynasty (circa 363-342 BC)

नन्द वंश का संस्थापक नन्द/नन्दिवर्धन था। पुराणों में इसे उग्रसेन भी कहा गया है। वह बड़ा योग्य, साहसी और प्रसिद्ध महत्त्वाकांक्षी साम्राज्यवादी सम्राट था। उसने मगध साम्राज्य का खूब विस्तार किया। उसके राजकोष में अपार धन-राशि होने के कारण उसे 'महापय' नद भी कहते थे।
नन्द वंश के शासनकाल में ही सिकन्दर का भारत पर आक्रमण हुआ सिकन्दर मकदूनिया (ग्रीस) का राजा था। वह विश्व विजय करना चाहता था पश्चिमोत्तर सीमा से सिंधु नदी पार करके उसने भारत पर आक्रमण किया (ई.पू. 326) पंजाब के कुछ भाग पर उसने विजय प्राप्त की, किन्तु मगध के सम्राट की शक्ति के विषय में सुनकर उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। व्यास नदी के तट से ही सिकन्दर वापस लौट गया। जिन क्षेत्रों को उसने जीता था, वहाँ के प्रशासन के लिये उसने अपने प्रतिनिधि नियुक्त कर दिये। सिकन्दर के आक्रमण के परिणाम महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। इस घटना के कारण भारत और यूनान के बीच सीधा संपर्क स्थापित हो गया। परस्पर व्यापार बढ़ा। सिकन्दर के साथ आये यात्रियों ने महत्वपूर्ण भौगोलिक वर्णन किया है। उन्होंने सिकन्दर के अभियान का तिथि सहित वर्णन किया जिससे हमें बाद की घटनाओं को भारतीय कालक्रम को निश्चित आधार पर तैयार करने में सहायता मिलती है। नन्द की विशाल सेना में लगभग 20,000 घुड़सवार सैनिक, 2,00,000 पैदल सैनिक, 2000 रथ और लगभग 4000 हाथी थे। भारी संख्या में हाथी रखने के कारण ही मगध के राजा अधिक शक्तिशाली माने जाते थे। नन्द वंश के अंतिम शासक घनानंद का वध करके चन्द्रगुप्त ने मौर्य साम्राज्य की नींव डाली।

राजनैतिक व प्रशासनिक जीवन शैली

political and administrative lifestyle

इस काल में राजा का पद बहुत शक्तिशाली हो गया था। वह अपने राज्य का प्रशासन आमात्य (मंत्री), पुरोहित (धर्मगुरु), संग्रहत्री (कोषाध्यक्ष), बलिसाधक (कर वसूलने वाले), शौल्किक (चुंगी वसूलने वाला), सेनापति ग्रामीण आदि के द्वारा चलाता था। उसे परामर्श देने के लिए परिषद होती थी। जिसके सदस्य ब्राह्मण रहते थे। योद्धा और पुरोहित कर से मुक्त होते थे। राजा किसानों से उनकी उपज का छटा भाग कर के रूप में प्राप्त करता था। व्यापारियों से माल की बिक्री पर चुंगी वसूली जाती थी। इस काल के सिक्के पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। ये प्राय: ताम्बे तथा चांदी के होते थे। इन्हें आहत या ठप्पे लगे (पंचमार्क) सिक्के कहते हैं।
कस्बों को बड़े कस्बों को पुर, नगर तथा महानगर कहते थे। उज्जयिनी, श्रावस्ती, अयोध्या, काशी, कौशाम्बी चंपा, राजगीर, वैशाली, प्रतिष्ठान, भृगुकच्छ प्रमुख नगर थे। ) मकान मिट्टी तथा पक्की ईंटों के होते थे। नगर के चारों तरफ प्राचीर और विशाल प्रवेश द्वार होते थे।

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
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