जनपदों और महाजनपदों का युग में सामाजिक एवं धार्मिक जीवन, वर्धमान महावीर, महावीर स्वामी की मुख्य शिक्षा, गौतम बुद्ध |

कलाकारों और शिल्पकारों को संगठित किया गया। एक ही पेशे से जुड़े लोगों के संगठन को श्रेणी कहा जाता था।

जनपदों और महाजनपदों का युग में सामाजिक एवं धार्मिक जीवन, वर्धमान महावीर, महावीर स्वामी की मुख्य शिक्षा, गौतम बुद्ध |

सामाजिक एवं धार्मिक जीवन

समाज में मुख्यत: चार वर्ण थे, परन्तु इस काल में अनेक जातियों का उदय होता भी दिखाई पड़ता है। बढ़ई, लुहार, सुनार, तेली, शराब बनाने वाले आदि जातियां बन गयी थीं। जाति जन्म से ही जानी जाती थी। कलाकारों और शिल्पकारों को संगठित किया गया। एक ही पेशे से जुड़े लोगों के संगठन को श्रेणी कहा जाता था।
धार्मिक कर्मकाण्ड और खर्चीले यज्ञों से लोग विमुख हो रहे थे। दो नये धर्मों का उदय हुआ था इनमें से एक बौद्ध धर्म है और दूसरा है जैन धर्म।

वर्धमान महावीर

महावीर का जन्म वैशाली गणराज्य में हुआ था। वर्धमान महावीर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर थे। सत्य की खोज में उन्होंने 30 वर्ष की उम्र में ही घर छोड़ दिया। लगभग 12 वर्षों की साधना के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद लगभग 30 वर्षों तक अपने उपदेशों का प्रचार करते रहे। अंत में लगभग 527 ई.पू. (पावापुरी) में 72 वर्ष की आयु में वर्धमान महावीर को मोक्ष प्राप्त हुआ।

महावीर स्वामी की मुख्य शिक्षा

1. हिंसा कभी नहीं करनी चाहिए।
2. सत्य का पालन करना चाहिए।
3. चोरी नहीं करना चाहिए।
4. संग्रह नहीं करना चाहिए।
5. ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

गौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। नेपाल के तराई क्षेत्र में, लुंबिनी वन नामक स्थान पर इनका जन्म हुआ। बचपन से ही गौतम का मन ध्यान और अध्यात्मिक चिन्तन की ओर था। 29 वर्ष की उम्र में ये घर से ज्ञान प्राप्त करने के लिए निकल पड़े। लगभग सात वर्षों तक भ्रमण के बाद बोध गया स्थान में, एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। तब से वे बुद्ध अर्थात प्रज्ञावान कहलाने लगे। ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अनेक वर्षों तक अपने सिद्धांतों का प्रचार किया। 483 ई.पू. वैशाख पूर्णिमा को कुशीनगर में बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ। बुद्ध की शिक्षाएँ इस प्रकार से हैं-
1. दुख का कारण तृष्णा है, तृष्णा से मुक्त होकर ही निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है।
2. अष्टांगिक मार्ग का पालन करने से दुःख दूर हो सकते हैं।
3. मनुष्य को पांच नैतिक नियम अपनाने चाहिए।
(1) किसी प्राणी की हत्या नहीं करना चाहिए।
(2) चोरी नहीं करना।
(3) झूठ नहीं बोलना।
(4) मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करना।
(5) व्याभिचार नहीं करना चाहिए।
आगे चलकर इन दोनों धर्मों ने बहुत उन्नति की। बौद्ध धर्म एशिया के विभिन्न देशों में पहुँच गया। जैन धर्म का भारत के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ।

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com

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