जल और पर्यावरण, पेयजल एवं प्राकृतिक जल का प्रकृति में अनुपात, जल चक्र एवं जल के प्रकार | Water and environment, ratio of drinking water and natural water in nature, water cycle and types of water.

हमें जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन के अतिरिक्त सबसे अधिक जल की आवश्यकता होती है।

जल और पर्यावरण, पेयजल एवं प्राकृतिक जल का प्रकृति में अनुपात, जल चक्र एवं जल के प्रकार | Water and environment, ratio of drinking water and natural water in nature, water cycle and types of water.

''जल है, तो जीवन है।"

हमें जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन के अतिरिक्त सबसे अधिक जल की आवश्यकता होती है, जिसका हम जीवन में सबसे अधिक उपयोग करते हैं। पृथ्वी पर जीवन जल के कारण ही है। अत: जल प्रकृति द्वारा दिया गया एक अनमोल उपहार है। जिसकी उपयोगिता गृह कार्य के अतिरिक्त, कृषि, उद्योग, बिजली बनाने आदि में अति महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि यदि आपके पास जल है तो आप कल की सोच सकते हैं, इसी सन्दर्भ में आपको ज्ञात होगा कि 22 मार्च जल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य जल के दुरुपयोग एवं प्रदूषण को रोकने तथा जल संरक्षण के प्रति जनमानस में जागरूकता पैदा करना है।

जल एक प्राकृतिक संसाधन है।

Water is a natural resource.

हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति अधिकांशतः प्रकृति द्वारा होती है प्रकृति से प्राप्त साधनों को ही हम प्राकृतिक संसाधन कहते हैं। जल, नदी, तालाब, कुओं, समुद्र, झीलों में पाया जाता है। अन्य ग्रहों पर जल नहीं होने से जीवन संभव नहीं है। प्रत्येक सजीव के लिए जल आवश्यक है चाहे वह सूक्ष्म हो या विशाल मानव शरीर में लगभग 65% से 70% जल पाया जाता है। सेव में लगभग 80% जल पाया जाता है। ककड़ी, कमल में लगभग 90% जाल होता है। टमाटर, बैलो फिज़ में लगभग 955% जल होता है। इससे जल के महत्व को समझा जा सकता है।
दीपक के घर अक्टूबर माह में बोरिंग किया गया। 180 फुट पर पर्याप्त मात्रा में पानी मिलने पर खुदाई रोक दी. गई। अप्रैल माह से बोरिंग में पानी की उपलब्धता कम होने लगी। जून अर्थात् वर्षा से पहले पानी आना बन्द हो गया। वर्षा शुरू होने के बाद बोरिंग से पुनः पानी मिलने लगा। दीपक ने इस बात को जब अपने विज्ञान के शिक्षक से पूछा तो उन्होंने बताया कि पृथ्वी से लगातार पानी निकालते रहने से जमीन में जल का स्तर नीचे चला जाता है। अतः बोरिंग से पानी आना बन्द हो जाता है, लेकिन जैसे ही वर्षा होतो है खेतों, मैदानों, तालाबों आदि से पानी रिसकर जमीन के अन्दर जाता है जिससे जल का स्तर बढ़ जाता है और बोरिंग से पानी पुनः आना शुरू हो जाता है। अतः पृथ्वी के अन्दर जल स्तर को भूजल स्तर कहते हैं।

पेयजल एवं प्राकृतिक जल का प्रकृति में अनुपात

Ratio of drinking water and natural water in nature

पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का 97% भाग समुद्र में है जो अधिक लवण युक्त होने से खारा है। पृथ्वी पर प्राप्त स्वच्छ जल 3% है, जिसमें 2% जल ध्रुवों, हिम नदी (ग्लेशियर), पर्वतीय चोटियों पर बर्फ के रूप में उपलब्ध है, जैसे सियाचिन ग्लेशियर, माउण्ट एवरेस्ट, मानसरोवर आदि। पृथ्वी पर 1% जल-भूमिगत जल झीलों, तालाबों; नदियों, कुओं, झरनों में हमारे उपयोग के लिए उपलब्ध है।

जल चक्र

Water Cycle

सूर्य की गर्मी से समुद्र तालाबों एवं सतही भण्डारों का पानी वाष्प बनकर वायुमण्डल में जाता है। गर्मी मे वाष्पन की प्रक्रिया तेज गति से होती है। वृक्षों की पत्तियों के द्वारा भी जल वाष्प वायुमण्डल में छोड़ी जाती है। पृथ्वी की सतह से बहुत अधिक ऊँचाई पर वाष्म जब जाती है तो वह ठण्डी हवा से टकराती है। एक निश्चित ऊंचाई पर हवा इतनी ठण्डी होती है कि जल वाष्प संघनित (condensed) होकर नन्हीं बूंदों में परिवर्तित हो जाती हैं। ये नन्हीं बूंदें हवा में बादलों के रूप में तैरती हैं। कई नन्हीं पानी की बूँदें एकत्रित होकर बड़ा रूप ग्रहण करती हैं और उनका भार बढ़ने से गिरने लगती हैं। इस प्रकार पानी की गिरती बूँदें वर्षा कहलाती हैं। विशेष परिस्थिति में कभी हिमपात और ओलावृष्टि भी होती है। वर्षा का जल ही भूमिगत जलस्तर में वृद्धि करता है। इस प्रकार जल समुद्र व पृथ्वी (नदी, तालाब आदि) से वाष्प के रूप में वातावरण की हवा में जाता है, जो वर्षा व बर्फ के रूप में वापस समुद्र व पृथ्वी पर आ जाता है जल का इस प्रकार चक्रण, जल चक्रण कहलाता हैं।

जल के प्रकार

Types of Water

आपने देखा होगा कि कुछ स्थानों पर तुअर की दाल जल्दी नहीं पकती है और पानी साबुन के साथ नहीं देता है। दाल देर से क्यों पकती है, खाबुन पानी के साथ झाग क्यों नहीं देता है? कारण यहाँ के जल में लवणों की अधिक घुलनशीलता है। इससे प्रश्न उठता है कि लवणों की घुलनशीलता से जल पर क्या प्रभाव होता है ?
प्रकृति में प्राप्त जेल लवणों को घुलनशीलता के आधार पर मृदु एवं कठोर होता है। कठोर जल में मैग्नीशियम, फैल्शियम तथा आयरन के क्लोराइड, सल्फेट आदि घुले रहते हैं। मैग्नीशियम एवं कैल्शियम के बाई कार्बोनेट से जेल में अस्थाई कठोरता उत्पन्न होती है जिसे पानी को उबालकर दूर किया जा सकता है। कठोर जल साबुन के साथ झा नहीं देता है। मृदु जल साबुन के साथ झाग देता है और भोजन पकाने एवं पीने के लिए उपयोगी होता है। समुद्र के जल में लवणों की अधिकता होने से जल खारा हो जाता है। एक लीटर समुद्री जल में लगभग 35 ग्राम लवण घुले रहते हैं।
कठोरता के आधार पर जल दो प्रकार का होता है-
(1) अस्थाई कठोरता
(2) स्थाई कठोरता
अस्थाई कठोरता पानी को उबाल कर दूर किया जा सकता है। हम चूने के पानी को मिलाकर भी अस्थाई कठोरता को दूर कर सकते हैं। स्थायी कठोरता को आसानी से उबालकर दूर नहीं किया जा सकता। लवण युक्त पानी को सिंचाई के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता है। पानी में अधिक मात्रा में घुले लवण छनी को खारा बना देते हैं। खारे पानी से जमीन कड़ी हो जाती है और पौधों की वृद्धि रुक जाती है इससे वे नष्ट हो जाते है। समुद्र का पानों खारा होने से सिंचाई के लिए उपयोगी नहीं होता है।

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
B B Patle
edubirbal.com

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